
नलिनी श्रीवास्तव नील, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
“अरे! आजकल बहुत उदास रहते हो?“ खिड़की ने दरवाज़े से पूछा।
“क्या करूँ, अकेला जो रह गया हूँ …” दरवाजे ने कहा।
“अकेला! कैसे?”
“पहले दो पल्लों वाला होता था, ” वह बोला, “बोलना-बतियाना, गले मिलना होता रहता था, अब खत्म!”
खिड़की बोली, “तो मुझसे बतिया लिया करो।“
दरवाज़े ने अपनी व्यथा कही, “मुझसे इतनी दूर तो रहती हो, मेरी बात तुम तक कैसे पहुँचेगी ?”
“कभी चरमराकर, कभी चौखट से टकराकर, और कैसे!” खिड़की इठलाकर सुझाया।
“चौखट कहाँ, तिखट ही रह गई है वह भी।” किवाड़ ने उदास आवाज में कहा, “ज्यादा टकराऊँगा तो स्टॉपर लगाकर हिलना-डुलना भी बन्द कर देंगे।”
खिड़की बोली, “यह तो है।“
दरवाज़ा बोला, “दो पल्ले होते थे तो दुःख-सुख आपस में कह लेते थे। गले मिलकर एक-दूसरे की भावनाओं का एहसास भी कर लेते थे। किसी के आने की उम्मीद रहती तो दोनों में से एक को खुला रखते थे। पर अब तो एक ही पल्ला! पूरी तरह बन्द हो जाता हूँ, या फिर घर के बुजुर्ग की तरह एक तरफ़ पड़ा रहता हूँ , दीवार से टिका हुआ।”
मर्मस्पर्शी रचना