
सुरेश परिहार, एडीटर, लाइव वॉयर न्यूज पुणे
महिदपुर रोड… एक ऐसा नाम, जिसे सुनते ही मन में अपनापन और गर्माहट फैल जाती है। यहाँ के लोग शुरू से ही एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहे हैं। यह परंपरा मैं बचपन से देखता आया हूँ और आज भी यही संस्कृति बरकरार है।
यहाँ का कोई मूल निवासी नहीं है। अधिकांश लोग बाहर से आए, काम के सिलसिले में बस गए और यहीं के होकर रह गए। समय ने इन्हें इस धरती का अपना बना दिया। मुंबई-दिल्ली मार्ग का रेलवे स्टेशन और उस जमाने की एकमात्र शुगर फैक्ट्री ने भी यहाँ बसने वालों की संख्या बढ़ाई। यही कारण है कि महिदपुर रोड में हर धर्म, हर संस्कृति और हर समुदाय का अपनापन झलकता है।
दही-हांडी और गणपति उतनी ही श्रद्धा और उमंग से मनाए जाते हैं जितनी बैसाखी और लोहड़ी। बंटवारे के समय आए पंजाबी परिवारों की कई पीढ़ियाँ आज यहाँ घुल-मिल गई हैं। शुगर मिल के कारण बसे महाराष्ट्रीयन परिवारों ने शिवाजीनगर का हिस्सा बसाया, और उनकी संस्कृति आज भी जीवित है। दादा, भाऊ, ताई, वहिणी, काका हर घर में अपनापन है। झुनका-भाकरी का स्वाद आज भी उसी तरह मिलता है।
महिदपुर रोड की असली पहचान यहाँ की सेवा भावना है। मेडिकल सुविधाओं का अभाव लंबे समय तक रहा। पहले इलाज के लिए खारवाकला, महिदपुर सिटी और नागदा के ग्रेसिम जनसेवा हॉस्पिटल पर ही निर्भर रहना पड़ता था। रात-बेरात जब किसी की तबीयत बिगड़ जाती, तो एंबुलेंस के नाम पर शुगर मिल की जीप या बड़े होटल वालों का ट्रक ही एकमात्र सहारा बनता।

(फोटो-डॉ. विजय यादव की फेसबुक वाल से साभार)
सौभाग दादा की निस्वार्थ सेवा की भावना आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। रात के किसी भी समय कोई भी बीमार पहुंच जाए, उनका ट्रक हमेशा एंबुलेंस की तरह तैयार रहता। उन्होंने कभी इसके लिए किसी से चार्ज नहीं लिया।
उस समय खारवाकला के डॉक्टर सी.एल. यादव ने भी लोगों की सेवा की, और आज उनके बेटे डॉ. विजय यादव इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
महिदपुर रोड केवल एक सड़क नहीं, यह सेवा, अपनापन और परंपरा की जीवंत मिसाल है। यहाँ हर मुस्कान में अपनापन झलकता है, और हर कदम पर प्रेम और सहयोग की परंपरा महसूस होती है।
Shandar
बहुत मार्मिक चित्रण महिदपुर रोड़ का। दिपावली, होली,गोगापुर का मेला,गन्ने की बेलगाड़ी, क्रिकेट के वो भयमुक्त कार्क व लेदर बाॅल के मेच ऐसा लगता है। एक विरासत छोड़ आया हूं। आज भी शुगर मिल व महिदपुर रोड़ की गलियों व पेड़ों में मन बसता है।
बहुत मार्मिक चित्रण महिदपुर रोड़ का। दिपावली, होली,गोगापुर का मेला,गन्ने की बेलगाड़ी, क्रिकेट के वो भयमुक्त कार्क व लेदर बाॅल के मेच ऐसा लगता है। एक विरासत छोड़ आया हूं। आज भी शुगर मिल व महिदपुर रोड़ की गलियों व पेड़ों में मन बसता है।
बढ़िया प्रस्तुति