
राकेश चंद्रा, प्रसिद्ध लेखक, लखनऊ
बरसात में झरते हैं आँसू बादलों से,
जो चिपक जाते हैं पत्तों और फूलों की चिकनी त्वचा पर;
या फिर लटक जाते हैं मोती बनकर बिजली के मीलों लंबे तारों पर;
शेष समा जाते हैं धरा की गोद में अमृत की बूंदों की शक्ल में।
बरसात में ढहते हैं जर्जर मकान ताश के पत्तों की तरह;
चढ़ जाते हैं लोग ऊपरी मंजिल पर,
निहारते हैं टकटकी लगाए किसी बढ़े हुए हाथ की तलाश में;
शहर की सड़कों पर तैरते हैं नंग-धड़ंग बच्चे
खुशियों का अंबार लिए, किसी एडवेंचर के नाम पर।
बरसात में बह जाते हैं काजीरंगा के एक सींग वाले गैंडे और हाथी;
यहाँ मरते हैं हर साल सैकड़ों पशु-पक्षी बरसात के आने पर।
बड़ी-बड़ी नदियों के भीषण बहाव में बह जाते हैं न जाने कितने आबादी के प्रायद्वीप;
गाँवों के लोग ढोते हैं अपने मकान की यादों को, बचे-खुचे सामान और गाय-बकरी के साथ छोटी-बड़ी नावों में;
छोटी-छोटी दूरियाँ पार की जाती हैं
बाँस, लकड़ी या केले के तनों को जोड़कर बनाए गए अस्थाई जुगाड़ों से।
झमाझम बरसते मेघों के बीच अब भी कहीं-कहीं
गूँजते हैं धरती के गीत, घरों की चौखटों के भीतर से,
जो आज भी लगते हैं तरोताज़ा, समय की तमाम विसंगतियों के बावजूद।
बरसात में नदी-नालों में बहते हैं साँप,
उड़ती चिड़िया फड़फड़ाती हैं अपने भीगे डैनों को सुखाने के लिए,
और कहीं-कहीं लुप्तप्राय मेंढक भी गाते हैं अपनी कर्णकटु मल्हार।
बरसात में ज़िंदा हो जाते हैं फिर एक बार
कुछ यक्ष प्रश्न — मकान, दुकान, राशन-पानी और ज़िंदगानी के हर साल,
और सोचते हैं लोग फिर से एक बार रिश्तों के बारे में।
बरसात में अब दिखाई नहीं पड़ती
छोटे-छोटे हाथों की वो नन्ही कागज की नावें,
जो कहीं कैद होकर रह गई हैं कंप्यूटर के ग्राफिक्स में।
बरसात तो फिर भी बरसात है पहले की तरह,
फिर भी ना जाने क्यों बरसात अब रूमानी नहीं लगती।