जाने कितने जंगलों को पार करती
उसकी साँसे मेरे कानों से टकराई थी
जैसे..
उसकी डूबती साँसे मुझे पुकार रही हो
निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थी
मैं और मेरी साँसे….
एक कवियत्री की आँखों में
खारे अश्क़ों की सघन तरलता थी
अश्क़ों ने उस देव_ के पैर
पखारने की ठान ली थी
विशालकाय हहराती गंगा में
मेरे चंद खारे आसूँ थे , प्रार्थना में लीन
भोर फिर रात फिर भोर
अंतस् का जागरण था…बुदबुदादते मेरे ओठ !
उस ब्रह्मांड ने अनमोल सांसे लौटा दी थी
संघर्ष चैतन्य हो उठा था…लंबी दूरियाँ नापनी बाक़ी थी अभी
मैं अब स्वँम को
पूरी तरह तैयार कर चुकी थी
मुझे उस भोर की प्रतीक्षा थी…
पावों में घुँघरू बांधे उत्सव की ओर
अग्रसर होना था , मुझे….
नृत्य को जीवन में उतार कर
मीठी सी एक लंबी साँस लेनी थी
जीवन के आयाम को पाने के लिए
नृत्य करना ज़रूरी था !

सरिता सिंह नेपाली, D/O बी.एस. “नेपाली “बेतिया (पश्चिम चम्पारण) बिहार