
पीयूष गोयल, वरिष्ठ साहित्यकार , दादरी (उत्तरप्रदेश)
एक कस्बे में दो घनिष्ठ मित्र रहते थे। बात आज़ादी के कुछ समय बाद की है।
एक दोस्त बहुत धनी था, दूसरा इतना धनी नहीं था। रोज़ कमाकर गुज़ारा चलाता था। लेकिन दोस्ती ऐसी कि लोग मिसाल दिया करते थे। दोनों अपने-अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे। एक दिन दोनों दोस्त साथ-साथ अपने घरों को जा रहे थे। विदा लेते समय निर्धन दोस्त ने 10 रुपये उधार मांगे। धनी दोस्त ने बिना देर किये पैसे दे दिये और बोला – “और चाहिए तो बताना।” निर्धन दोस्त बोला – “नहीं बस 10 रुपये ही काफी हैं।”
अगले दिन धनी दोस्त अपने दोस्त का इंतज़ार करता रहा। सुबह से दोपहर हो गई , पर वो न मिला।
चिंता होने लगी। बहुत देर इंतज़ार करने के बाद वो अपने दोस्त के घर पहुंचा -घर पर ताला लगा था।
पड़ोसियों से पूछा सबने कहा “हमें कुछ नहीं बताया। हाँ, सुबह करीब 4 बजे घर में कुछ हलचल ज़रूर थी।”
धनी दोस्त सोच में पड़ गया बिना बताये कहाँ चला गया?हर रिश्तेदार, हर परिचित के यहाँ पता लगाया पर कुछ पता नहीं चला।
समय बीतता गया।
धनी दोस्त कुछ समय बहुत परेशान रहा, फिर समय के साथ शादी हो गई, बच्चे हो गये, व्यापार में व्यस्त हो गया।
लेकिन जब भी मौका मिलता वो अपने खोए दोस्त के बारे में पूछताछ करता था। कोई सुराग नहीं मिला।करीब 25 साल बाद व्यापार के काम से उसे लखनऊ जाना पड़ा। एक सप्ताह रुकना था।विचार आया . थोड़ा शहर भी घूम लिया जाए।
एक दिन दोपहर का भोजन करने वह एक होटल में रुका।
उसी होटल का मालिक वही निर्धन दोस्त था। उसने धनी दोस्त को तुरंत पहचान लिया। जैसे ही सेठ ने खाना खाने के बाद बिल देने के लिए काउंटर पर पैसे बढ़ाए -दोस्त ने पैसे लेने से इंकार कर दिया।
वह फूट-फूटकर रोने लगा और बोला -“मैं तेरे वो 10 रुपये वापस नहीं करूँगा!”
धनी दोस्त ये सुनकर उसे गले से लगा लिया। दोनों बहुत देर तक रोये।
धनी दोस्त बोला-“अरे पगले! मैं 10 रुपये लेने नहीं आया हूँ। बस तू बिना बताये चला गया था… इसी का दुःख था।”
दोनों ने देर तक बातें कीं। धनी दोस्त उसे अपने घर लेकर आया और अपने बच्चों से मिलवाया।
बेटे को कहा -जा, अपने ताऊ का सामान होटल से ले आ।” रात को सब साथ बैठकर बातें कर रहे थे। निर्धन दोस्त ने बताया -“उस दिन तेरे दिए हुए 10 रुपयों से मैंने चाट की रेहड़ी लगाई थी। मेहनत की। आज ये होटल और ये मकान उसी से हैं। मुझे पता है पैसे की क़ीमत क्या होती है इसलिए वो 10 रुपये मैं कभी वापस नहीं करूँगा!” इसके बाद दोनों परिवारों में आना-जाना शुरू हो गया। सबको पता चल गया कि दो बिछड़े दोस्त फिर मिल गये हैं।
कुछ दिन बाद लखनऊ वाला दोस्त बोला -“जो हमारा पुश्तैनी मकान है -वो मैं तेरे नाम कर देता हूँ। एक दिन आकर सब से मिलूँगा और मकान के कागज़ तेरे हवाले कर दूँगा।”
बहुत ही प्रेरणादायक और भावनात्मक कहानी है
बहुत ही प्रेरणादायक और भावनात्मक कहानी है