
सरिता सिंह “ नेपाली “ बेतिया , पश्चिम चम्पारण, बिहार
एक अंधी भिखारन को हर रोज मैंने
मैट्रो स्टेशन के पास भीख माँगते देखा था।
कई बार रुककर कुछ सहयोग राशि
उसकी झोली में मैं भी डाल जाती।
उसे देखने की मेरी भी जैसे आदत पड़ गई थी।
इक दिन उसे नहीं पाकर बगल के फल बेचने वाले से
पूछ लिया —
“भइया, वो माँ नहीं आई क्या आज?”
पता चला उसकी तबियत ठीक नहीं।
उसी फल वाले से उसका पता पूछ लिया था।
दूसरे दिन तड़के ही उधर का रुख लिया।
घर में असहाय अवस्था में पड़ी वो कराह रही थी।
हां, मगर एक जवान, खूबसूरत सी लड़की
अपने फटे कपड़ों को सम्भालती उसकी सेवा में जुटी थी।
देखकर मन द्रवित हो उठा।
कई साल पहले रोड एक्सीडेंट में
इस बच्ची के माता-पिता चल बसे।
धीरे-धीरे दादी की आंखों की रौशनी
मोतियाबिंद निगल गया।
अब भीख मांगने के अलावा कोई चारा न था।
उफ़्फ़… ज़िन्दगी… कितनी बदसूरत शक्ल थी… तेरी।
मैंने उस बच्ची को
अपने घर का सहयोगी बना डाला।
मेरी दृष्टि में भीख मांगना
स्वाभिमान को गिरवी रखने जैसा था।
सुंदर रचना
Excellent