
सपना परिहार, लेखिका, नागदा जं. (मध्यप्रदेश)
वह कोई स्त्री ही रही होगी,
जिसने अपने ऊपर ढेर सारी ज़िम्मेदारियाँ खुद ही लाद ली होंगी
और पीढ़ी दर पीढ़ी “महान” बनती चली गई होगी।
यह महानता उसने कभी छोड़ने की कोशिश नहीं की
सबके प्रेम की आशा में, सम्मान की इच्छा से।
वह सारे काम यह सोचकर करती रही कि
“सारे काम तो स्त्री ही करती है।”
और इन्हें अपने सिर पर लादती चली गई।
पर… क्या यह ज़रूरी नहीं था कि एक बार ना कह देती?
और कहती कि
“तुम और मैं मिलकर सारी ज़िम्मेदारियाँ बाँट लेंगे।
काम का बँटवारा लिंग के आधार पर नहीं,
समानता के आधार पर होना चाहिए।”
शायद उस समय स्त्री हिम्मत नहीं जुटा पाई।
पुरुष से यह कहने की ताक़त नहीं बटोर पाई कि
“नहीं, मैं यह काम नहीं करूँगी।
यह सिर्फ मेरा काम नहीं है।”
और आज भी, एक माँ के रूप में,
वही स्त्री अपनी बेटी को यही सीख देती आ रही है
“मैंने किया है, तुम भी करो।
भले पढ़ो-लिखो, पर ‘ना’ मत कहना।
हर वह काम करो, जो तुमसे कहा जाए।”
अगर कभी उस समय स्त्री एक बार ‘ना’ कह देती,
तो शायद आज काम का सही बँटवारा होता।
दोनों ही मिलकर अपने परिवार को
खुशी-खुशी संभालते
बच्चों के लालन-पालन से लेकर शिक्षा और भविष्य तक।
हर बात में सामंजस्य और
अपनी बात रखने का बराबर अधिकार होता।
स्त्री…
तुमने क्यों लाद ली अपने ऊपर इतनी सारी ज़िम्मेदारियाँ?
आज भले ही तुम आगे बढ़ गई हो,
पर खाना बनाना और घर के सारे काम
अब भी सिर्फ तुम्हारे हिस्से में क्यों आते हैं?
क्यों नहीं मना कर पाई तुम?
क्योंकि तुमने उस समय हिम्मत नहीं जुटाई
और आज भी कहीं न कहीं
दूसरों की खुशी के लिए
‘ना’ नहीं कह पाती हो।
Sahi kaha ma’am aap ne hum aaj bhi naa nhi kah pate hai