
आद्या रेेणु, प्रसिद्ध लेखिका, उदयपुर (राजस्थान)
“हम औरतें हैं जनाब, चलाने पर आ जाएँ तो रॉकेट भी चला लें… और तुम स्कूटी की बात करते हो…”स्कूटी चलाना कोई बड़ी बात नहीं है. आज औरतें बस, ट्रक, एयरप्लेन वगैरह भी चला रही हैं. फिर भी आप लोग पीछे ही पड़े रहते हैं “लड़कियाँ अच्छी तरह स्कूटी नहीं चला सकतीं, उन्हें राइट और लेफ्ट का पता ही नहीं होता, वो राइट का इंडिकेटर देकर लेफ्ट में मुड़ जाती हैं…” आपको क्या लगता है, हमें राइट और लेफ्ट का पता नहीं है?
कल ही की बात है. मैंने देखा, एक बंदा अपनी तेज रफ्तार मोपेड पर बैठा जा रहा था, स्पीड लगभग 80 रही होगी. तभी उसके आगे एक लड़की स्कूटी पर अचानक से आई, उसकी स्पीड कोई 40–50 रही होगी. पता नहीं मोपेड को क्या हुआ, 80 से 40 पर आ गई. खैर, स्पीड तो कम हुई सो हुई, भाईसाहब राइट का इंडिकेटर देकर लड़की के पीछे लेफ्ट में मुड़ गए. हम अपनी आँखें फाड़े देखते रह गए.ये क्या हो रहा है! खैर, लड़की समझदार थी, उसने राइट का इंडिकेटर दिया था और लेफ्ट में मुड़ गई थी. अब आप ही बताइए, उसने गलत क्या किया? ऐसे मनचलों से बचने का और उपाय क्या है?
आखिर जहाँ हर रोज़ छेड़छाड़, रेप आदि की खबरों से अखबार भरा रहता है, वहाँ इतनी सुरक्षा तो हमें खुद ही करनी होगी. हमें पता है राइट और लेफ्ट में क्या अंतर होता है. जो लड़की पिंक रंग के 100 शेड्स बता सकती है, क्या उसे इतना भी नहीं पता होगा? जो लोग सोचते हैं कि लड़कियों को गाड़ी नहीं चलानी चाहिए, सच कहूँ तो उन्हें अपनी ही नीयत पर भरोसा नहीं होता. और नहीं तो क्या! अब आप ही देख लीजिए.किसी लड़की को स्कूटी से जाते हुए देखो, उसके पीछे लड़कों की हायाबूसा, रॉयल एनफ़ील्ड 30–40 की स्पीड से रेंगती हुई. बेचारा वो बाइक भी सोचता होगा.”जब इतनी ही धीमी चलानी थी, तो साइकिल ले लेनी थी, मेरी क्या ज़रूरत थी?”
वैसे लड़कियों की स्कूटी के पीछे तो पूरा जहाँ पड़ा रहता है. लोगों ने जैसे ये मान्यता ही बना ली है कि लड़कियाँ गाड़ी नहीं चला सकतीं. अगर गलती से कहीं ठोकर लग जाए, तो आँख बंद करके कह देंगे. लड़की की ही गलती है. क्यों भाई, लड़कों ने क्या गाड़ी चलाने की PhD कर रखी है? अगर ऐसा होता, तो ये सारे एक्सीडेंट कैसे हो रहे हैं?
इसी बात पर मेरी अपने ही एक मित्र से बहस हो गई. उसने कहा, “जो काम स्त्री के बस का नहीं है, वो उसे नहीं करना चाहिए.”
मैंने पूछा, “क्या?”
वह बोला, “और क्या, यही गाड़ी–वाड़ी चलाना.”
मैंने कहा, “तुम्हें इससे क्या प्रॉब्लम है, बताओ ज़रा?”
उसने कहना शुरू किया, “प्रॉब्लम ही प्रॉब्लम है. गाड़ी हाथ में लेकर ऐसे उड़ती हैं जैसे हवा में उड़ रही हों. पैर से गाड़ी रोकती है. भला पैर से कौन गाड़ी रोकता है! और गाड़ी में दो साइड ग्लास दिए हैं, ज़रा देख तो लें कि पीछे कोई आ रहा है कि नहीं!”
मैंने कहा, “क्यों? पीछे वाले की आँखें नहीं हैं? उसे आगे दिखता नहीं? अब गाड़ी चलाएँ या चारों ओर आँखें रखे -बोलो?”
उसने मेरी तरफ देखकर मुँह बनाया और बोला, “हाँ, तुम तो खुद स्त्री हो, स्त्री की साइड ही लोगी. अब तुम्हें क्या पता, ये स्कूटी वाली लड़कियाँ दिल तोड़ देती हैं. इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता…”
मैंने आश्चर्य से कहा, “ऐसा क्या?”
वह बोला, “और नहीं तो क्या! कल रास्ते में बाइक खराब हो गई. लिफ्ट माँगनी पड़ी. एक लड़की ने लिफ्ट दे दी. अब क्या बताऊँ, ऑफिस पहुँचने में देर हो गई, बॉस की डाँट पड़ी सो अलग, हाफ डे भी लग गया.”मैंने कहा, “क्यों, इतनी धीरे चला रही थी?”
वह झेंपते हुए बोला, “अरे नहीं, उसने तो सही चलाया. मैं ही मंज़िल पर उतरना भूल गया…”
अब बताओ, भलाई का तो ज़माना ही नहीं रहा. इसमें उस लड़की का क्या कसूर था? और गलती किसकी थी?
लड़कियाँ बिल्कुल सही चलाती हैं गाड़ियाँ अपना दोष किसी और के मत्थे मढ़ना ठीक नहीं.
खैर…
हम तो स्कूटी चलाते रहेंगे,
हवा में अपने पंख फैलाते रहेंगे,
किसी को मिर्ची लगी तो हम क्या करें…
बहुत बहुत आभार आपका सर, मेरी रचना को स्थान देने के लिए 🙏🙏🙏🙏😊😊
मजेदार …. मेरे स्कूटी वाले दिनों की याद दिला दी आपने। और ऐसी कई घटनाएं ।
बहुत मज़ा आया पढ़कर! कमाल की लेखनी… कहने का अलहदा अंदाज!👏👏
wonderful
हँसी का तडका मजा आ गया पढ़कर
हास्य का तडका मजा आ गया
very well written
सड़क दुर्घटनाओं के लिए हमेशा महिलाएं ज़िम्मेदार नहीं होती हैं इसलिए उन्हें खराब ड्राइवर कहकर generalize करना बिल्कुल अनुचित है। यदि सड़क पर गाड़ी चलाने वाला हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को समझे और सावधानी पूर्वक गाड़ी चलाए तो किसी को भी दोष देने की जरूरत नहीं पड़ेगी, फिर वो चाहे महिला हो या पुरुष।
आपका लेख सराहनीय है।