मत करो मुझे इतना प्यार।
और कितना है हमारा साथ?
पता है, मुझे मेरी इन बातों से
अब थोड़े झुंझलाते हो तुम।
पर सुनो…
मुझे अपनी बाहों में लिए,
टुक-टुक मेरे चेहरे को निहार रहे हो,
शायद मेरी साँसों में अपनी साँसों को पिरो रहे हो।
आज भी अपनी नज़रों से ही जवाब दे रहे हो।
जवाब मुझे पता है और तुम्हें भी,
वक़्त ही तो नहीं है हमारे पास।
बस, इस कुछ पल में समेटना चाहती हूँ—
अपनी सिंदूरी शाम,
सितारों से भरी हुई चांदनी रात,
शीतल-शीतल चलती हवा,
बागों से आती भीनी-भीनी खुशबू,
और हाथों में तुम्हारा हाथ।
तुम वैसे ही गुनगुनाओ
जैसे पहले मुझे देख गुनगुनाया करते थे।
तुम्हारे होंठों पर मुस्कान देखते हुए
मैं विदा होना चाहती हूँ।
तुम्हारे नैनों के कोर में छुपे हुए आँसुओं को देख
मैं विचलित हो जाती हूँ।
यह जो शरीर रूपी पिंजड़े में प्राण का पाखी है,
उसकी कुंडी अपने अधरों की मुस्कान से खोल दो।
सुनो ना…
मत करो मुझे इतना प्यार।
और कितना है हमारा साथ?

उपासना सिन्हा, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर (झारखंड)