
डॉo संजुला सिंह “संजू” वरिष्ठ पत्रकार, कवयित्री, जमशेदपुर (झारखंड )
सर्दी का मौसम है आया
खूब भयंकर नाक बहाया।
रजाई-कंबल की शान बढ़ी है,
मानो सीना तान खड़ी है।
सुबह तनिक भी राह न दिखती,
हाथ-पांव भी रहे सिकुड़ती।
भूमि पर पांव न सीधे पड़ता,
धरते ही पांव ठिठुरने लगता।
बूढ़े थर-थर कांप रहे हैं,
युवा भी जैकेट में ही पड़े हैं।
बच्चों के खेल भी छूट गए हैं,
लगता दिवाकर रूठ गए हैं।
घर की नारी भी अलसाई,
इतनी भयंकर सर्दी आई।
पूजा-पाठ भी हो गई आधी,
स्वेटर-शॉल को हमने साधी।
चाय-पकोड़े की फरमाइश,
किसी की कम न होती भाई।
मन नहीं करता कुछ करने का,
बस मन करता दुबक रहने का।
ऐसी सर्दी कभी न देखी,
ताकत सबकी हो गई रूखी।
सर्दी सबको सता रही है,
फीवर-खांसी रुला रही है।
अग्नि से सबकी हो गई यारी,
लगती सबसे अधिक ये प्यारी।
इनका सेवन मन को भाए,
सर्दी को ये दूर भगाए।
भास्कर दादा रहम कीजिए,
कुछ तो अपनी गर्मी दीजिए।
सबका मन हो गया है आकुल,
तेरा दर्शन पाने को व्याकुल।
कृपा कुछ अपनी अब कीजै,
अपनी गर्मी हमको दीजै।
बच्चे-बूढ़े-युवा सभी पर,
अपनी रहम की चादर दीजै।