
डॉ.रश्मि प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
बचपन बीते हुए जवान,
Diplomacy का क्या है राज।
माँ-बाप ने दिए संस्कार चार
प्रेम, सत्य, क्षमा और सम्मान,
पर Diplomacy का ज्ञान नहीं दिया।
जब रखा कदम डेरी से बाहर,
तब जाना- संस्कारों का न था कौड़ी का दाम।
हुआ अचंभा देख दुनिया का राग,
तब सोचा -जाने Diplomacy का क्या है राज।
पता चला इसके भी हैं स्तंभ चार –
झूठ, धोखा, मक्कारी और चलबाज़।
बड़ी कशमकश में फँस गए यार,
लेना था सिर्फ चार का ज्ञान।
सोच-समझकर किया विचार
थाम लो Diplomacy का हाथ,
वरना कुछ न लगेगा हाथ।
मन बोला – संस्कारों की रखोगे लाज,
तो भोगना होगा परिणाम चार
मुर्ख, पागल, सनकी और हसीं का पात्र।
बुद्धिमानी इसी में है
Diplomacy से मिला लो हाथ।
इसके भी हैं फायदे चार
पद, प्रतिष्ठा, दौलत और सम्मान।
दुनिया भर में थी Diplomacy की भरमार,
Diplomacy से लो काम, सबका था ज्ञान।
सौदा महंगा था –
ज़मीर बेचना था इसका दाम।
सोचा यह फार्मूला दुनिया पर आजमाएंगे,
घर-परिवार में तो रिश्ते निभाएंगे।
इस तरह यह किस्सा बन गया –
Diplomacy के चक्कर में हिस्सा बन गया,
आधा घर में और आधा दुनिया में बट गया।
Diplomacy करते-करते हुआ बड़ा नुकसान
इसमें खो गए आभूषण चार –
प्यार, विश्वास, अपनापन और आदर-सम्मान।
सोचा जब रख दिए थे ताक पर माँ-बाप के संस्कार,
पता न था होगा इतना भयंकर परिणाम।
देख लेते अगर Diplomacy के दूरगामी परिणाम,
तो दुनिया में न होता “भ्रष्टाचार” का “जंगलराज”।