
अंजू ‘सुंदर’ सहायक प्राध्यापक, लखनऊ (उ.प्र)
मेरे घर के पिछले वाले कमरे में
बरसों-बरस बड़े जतन से सहेजा गया
रखा है एक बड़ा-सा संदूक।
संदूक के एक कोने में बड़ी तरतीब से
सजाया है माँ ने अपना मायका
और अपनी माँ के हाथों गढ़े-ब्याह के सामान को।
काले-सफेद पन्नों वाली मखमली चित्राधार में,
दालान भर परिवार के बीच अधखुली चोटियों में खड़ी
विस्मित-सी निहारती दिखती है एक छोटी-सी लड़की।
अगले ही पृष्ठ पर बदल जाता है रूप-लावण्य —
करीने से गूंथी वेणी और सौंधे आभूषणों से सुसज्जित,
ठसक भरी मुस्कान और ललाट पर सूर्य धरे
सुघड़-सी युवती आलोकित।
थोड़ी दूर पर वहीं रखे हैं वो साथ भेजे गए
बटुला, लोटा, कटोरा, चमचा और परात भी,
जिसमें गुदवाया गया था नाम बेटी और दामाद का।
उन्हें छाती से लगाकर वह आँखें मूँद
भरती है गहरी श्वास,
जैसे आ रही हो अब भी उनसे सुगंध
मायके के चूल्हे पर चढ़ी सोंधी अदहन वाली दाल की।
वहीं बगल में रखी है एक और पोटली,
जिसमें बाँधकर रखा गया है अभी तक
प्रथम मातृत्व के अहसास को।
छोटे-छोटे वस्त्र — हाथ की बुनाई और सिलाई के,
उनका स्पर्श करते ही भर जाते हैं नेत्रों के कोर आज भी
और बरसती है पीड़ा मुझ तक पहुँचने में झेले वनवास की।
एक फाइल में बंद रखे हैं राजा और रंक के टिकट,
बॉम्बे से भेजा गया तार, फिर मनीऑर्डर का पलटवार,
और पहली बार खरीदकर घर आई साइकिल की रसीद भी।
उसी फाइल में मिलते हैं बदलाव के निशान —
मेरा नर्सरी का अंकपत्र और ढहता इतिहास का गाँव,
और… दबा दिया गया उसी फाइल की परतों में
बेटी पैदा होने के संशय को।
छूने की इजाज़त नहीं इस यादों वाली पिटारी को,
जिसमें बसा है बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक का दोहन,
जो सिमटता है धीरे-धीरे चित्रों, कपड़ों और दस्तावेज़ों में।
झुर्रियों वाले हाथ स्फूर्त हैं माँ की चिकनकारी ओढ़ने को,
आँखों की दमक बढ़ती तस्वीरों में खुद को युवा पाते,
और फिर कुछ ठहरकर ब्याह की तस्वीर भी वहीं ले आती है।
संदूक और मेरी उम्र में फ़र्क नहीं — हर बार बताती,
मुझे दिखाकर तृप्त होती माँ मानो चाहती हो कहना
कि मैं सहेजकर रखूँ उनके मायके के इस कोने को अंत तक।
लंबे संघर्ष की स्मृतियों से भरे बक्से में
एक छोटा-सा कोना मैंने खुद का भी रचा —
उहापोह से लड़ते-लड़ाते
‘संदूक भर जीवन’ बचाकर रख लिया।
बहुत अच्छी लेखनी
जी धन्यवाद आपका
अति उत्तम रचना
सम्पादक सुरेश जी का धन्यवाद
एक ब्याहता स्त्री के साथ मायके की ओर से उसके ससुराल में एक सन्दूक भेजने की परम्परा है जिस में उसकी अपनी चीज़ें रखी होती हैं और अपनी कीमती यादगारों को वह इसी में सहेजकर
जीवन पर्यन्त रखती जाती है । मां सिर्फ अपनी बेटी को इस सन्दूक के ” रहस्यों का साझेदार बनाती है ।
सन्दूक में बन्द हर स्त्री का थोड़ा-बहुत जीवन और अनमोल यादें होती हैं ।
बहुत सुंदर चित्रण के लिए ” अन्जु जी ” बहुत बधाई।
अति सुन्दर रचना की अति सुन्दर समीक्षा। अंजू जी एवं विनीता जी दोनों बधाई के पात्र हैं।