श्रम आधार

चलो निरंतर लक्ष्य साध कर, हार मिले या जीत।

कर्मवीर निज धर्म निभाते,श्रम से करते प्रीत।।

मनमोहक देखें नित सपने, करें नित्य साकार।

मन दर्पण में जलती ज्वाला,होता श्रम आधार।।

सागर जैसी उठी उमंगें, बदलें जग की रीति।

कर्मवीर निज धर्म निभाते,श्रम से करते प्रीति।।

पल-पल मौसम रंग बदलता, देता यह संदेश। 

सेवा संयम श्रम की पूँजी, सुखी रहे परिवेश।।

फागुन लाता ऋतु बासंती, सुनो समय का गीत।

कर्मवीर निज धर्म निभाते,श्रम से करते प्रीत।।

चला सिपाही लिए हौसला, भरी समर हुंकार।

शत्रु के तब दहले सीने, गूँज उठा ऊंकार।।

फौलादी सीने में सपना,सकल विश्व की जीत।  

कर्मवीर निज धर्म निभाते,श्रम से करते प्रीत।।

सीमा गर्ग ‘मंजरी’
सुप्रसिद्ध साहित्यकार ,मेरठ कैंट

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