व्यथा वृक्ष की…

जड़ें तो बहुत मज़बूत ही थीं,
गहराई में रोपित थीं,
दूर-दराज़ तक फैली हुई थीं।

जालिमों ने इतने वार किए,
नहीं संभाल पाया
यह कोमल तन और मन।
कोमल, नर्म रुई के फाहे-सा
झर गया पत्ता-पत्ता,
झर गया रेशा-रेशा।

एक दिन जर्जरित होकर,
फिर भी तटस्थ खड़ा,
आशान्वित होकर
भरे मन से सोच रहा यही—
क्या ग़लत किया?

सबको आसरा देकर,
इन्हीं शाखाओं पर लदे
फल-फूल देकर,
सबकी उदर-तृप्ति करके।

नव-कोंपलें तो फिर फूटेंगी,
दिखेगा हरा-भरा फिर भी।
कितने भी वार कर लें निर्मोही,
कल पछताएँगे यही सोचकर—

मैं हूँ तो यह धरती है,
मुझ पर ही जीवन है निर्भर।
तुम मुझे पोषित करो,
मैं तुम्हें संरक्षण दूँगा।।

निरुपमा सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, बिजनौर

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