
रश्मि मृदुलिका, देहरादून( उत्तराखण्ड)
सोमेश की कंपनी में नया प्रोजेक्ट शुरू हुआ था, इसलिए अब उसे ऑफिस में ज़्यादा देर तक रुकना पड़ता था. इस बात से उसका मन खिन्न हो रहा था. दस बजे की मेट्रो से उतरकर वह ऑटो की ओर बढ़ा. जैसे ही वह ऑटो में बैठा, वैसे ही एक खुशबू का झोंका उसकी नाक से टकराया.
रुको, मुझे भी ले चलो, लगभग हांफते हुए उस लड़की ने कहा.
वो खूबसूरत चेहरा, हिरणी सी आंखें, बाल हवा में बिखरे हुए, साड़ी पहने हुए थी. कहते-कहते ही वह बैठ गई.
अरे! ऐ, इन साहब ने ऑटो रुकवाया है, तुम किसी और में चली जाओ, ऑटो वाले ने डपटते हुए कहा.
प्लीज़, मुझे भी ले चलो, आपको कोई दिक्कत नहीं होगी, उसने बड़े कोमल स्वर में कहा.
ठीक है, मुझे कोई दिक्कत नहीं, सोमेश ने जैसे किसी सम्मोहन में कहा. वह तिरछी नज़र से उस लड़की को देख रहा था, जैसे आंखें बगावत कर रही हों कि हम नहीं हटेंगे. उसने इतनी सादगी और मासूमियत पहली बार देखी थी. लड़की समझ गई्. उसने हँसते हुए कहा, तिरछी नज़र से देखने से बेहतर है सीधे देख लीजिए, और वह उसकी तरफ़ मुड़ गई्.
वह हकबका गया. इसके लिए वह तैयार नहीं था. वह झेंप गया कि उसकी चोरी पकड़ी गई.
न-नहीं, दरअसल… आप इतनी सुंदर हैं तो…अच्छा! वह मुस्कुराई. क्या मैं जान सकता हूँ, आपका नाम क्या है? सोमेश ने पूछा.
हॉं, मैं सुमन हूँ, उस लड़की ने कहा.
मैं सोमेश, नोएडा में जॉब करता हूँ्. और आप? क्या जॉब से आ रही हैं? इतनी रात तक शिफ्ट चलती है? उसने पूछा.
जी, मेरी शिफ्ट रात को ही चलती है, उसने गंभीर होकर कहा.
ओह! लड़कियों के लिए इतनी देर तक काम करना आसान नहीं होता, उसने फिक्र से कहा.
जी, कुछ लड़कियों के लिए दिन का उजाला रात के अंधेरे से ज़्यादा कठिन होता है, उसकी आवाज़ में अजीब सी उदासी थी.
घर पर मॉं-पिताजी हैं, पढ़ने वाला छोटा भाई है. फीस, किराया, खाना, कपड़े जुटाना कठिन है, और रात काटना आसान है. दिन की नौकरी आसान हो जाती तो रात कठिन क्यों होती? वह ऑटो से बाहर चेहरा करते हुए बोली, जैसे ज़िंदगी की कठिनाई को हवा के झोंके से मिटा देना चाहती हो.
सोमेश को उससे एक लगाव-सा महसूस हुआ्. जैसे उसकी आवाज़ उसके सीने में उतर रही थी. ऐसा एहसास उसे पहली बार हुआ था. वो चाहता था कि यह सफ़र कभी खत्म न हो.
भाई, रोको! मेरी मंज़िल आ गई, उसने खिलखिलाते हुए कहा.
ठीक है, किराया मैं दे दूँगा, उसने लड़की से कहा.
न-न, आधा किराया मैं दूँगी. पैसा बड़ा कीमती होता है जनाब, वह फिर हँसी.
ठीक है, उसके स्वाभिमान के आगे वह झुक गया.
उसने अपनी जेब में हाथ डाला, लेकिन यह क्या जेब तो कट गई थी!
ओह, मेरी जेब कट गई! सोमेश ने चिंता से कहा.
कोई बात नहीं, मैं किराया दे दूँगी, लेकिन अपनी जेब संभालकर रखो. ये दिल्ली है, महाशय!
सॉरी, मैंने आपको परेशान कर दिया, उसने शर्मसार होते हुए कहा.
ज़िंदगी ने इतनी मेहरबानी की है,
कि परेशानियों से दोस्ती हो गई है…
वह गुनगुनाते हुए चली गई्. वह उसे जाते हुए देखता रहा, जैसे उसका दिल उसी के साथ चला गया हो. रात भर उस लड़की का चेहरा आँखों में घूमता रहा. उसे सोचकर रोमांच हो गया कि शायद उसे प्यार हो गया है. काश! वो फिर मिल जाए, उसने सोचा.
अगले दिन वह मेट्रो से उतरकर सड़क पर आया. उसकी नज़रें उसी लड़की को ढूंढ रही थीं, लेकिन वह कहीं दिख नहीं रही थी. उसका मन उदास हो गया. मैं भी कितना बेवकूफ हूँ, फोन नंबर तो ले लेता, उसे अफसोस हो रहा था.
अरे साहब, चलोगे क्या? ऑटो वाले की आवाज़ आई्. वह बेमन से ऑटो में बैठ गया. अचानक फिर वही खुशबू उसकी नाक से टकराई्. उसने बाहर देखा गुलाबी सूट पहने वो तेज़ कदमों से ऑटो की ओर बढ़ रही थी.
रुको भाई! उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं्. माथे पर पसीने की बूंदें मोतियों जैसी चमक रही थीं, जो उसके चेहरे को और मासूम बना रही थीं्. उसे न जाने क्यों उस पर प्यार आ रहा था, जैसे वह अपनी उंगलियों से उस पसीने को पोंछ देना चाहता था.वह लड़की उसे बिना देखे बैठ गई.अरे, उतरो! ये ऑटो तुम्हारे लिए नहीं है, ऑटो वाला गुस्से से बोला.
मैं तो चलूंगी, उसने हँसते हुए कहा.सोमेश को ऑटो वाले पर गुस्सा आया.
इन्हें बैठने दो, रात का टाइम है, महिलाओं की मदद करनी चाहिए. मुझे क्या! वो ऑटो वाला हिकारत से बोला.
ओह, आप आज फिर मिल गए! उस लड़की ने चौंकते हुए कहा.जी, शायद ईश्वर चाहता है हम मिले, सोमेश ने बड़े प्यार से कहा.ईश्वर न करे, वह बोली. उसे न जाने क्यों अच्छा नहीं लगा. वह उसे अपने दिल की भावनाएँ बताना चाहता था, लेकिन ये सोचकर चुप रह गया कि कल ही तो मिले हैं, न जाने वह उसके बारे में क्या सोचेगी.
उसने बात की शुरुआत की, तुम कहॉं जॉब करती हो?
मैं एक जगह जॉब नहीं करती, उसकी आवाज़ तीखी थी.
उसे लगा शायद वह बताना नहीं चाहती. उसने आगे कुछ नहीं कहा.
उस लड़की ने उसी जगह ऑटो रोका, जहॉं कल रात रोका था. सोमेश ने उससे कहा, आज किराया मैं ही दूँगा, कल आपने दिया था.
अच्छा! तो तुम मेरा कर्ज़ा उतारना चाहते हो? वह खिलखिलाकर हँसते हुए चली गई. वह चाहता था कि उसे पुकारे प्लीज़ मत जाओ. लेकिन आवाज़ गले में अटक गई.क्या साहब, इस औरत को ज़्यादा मुँह मत लगाओ्. ये धंधे वाली है, इसका तो रोज़ का काम है. आप शरीफ घर के लगते हो, ऑटो वाले की आवाज़ उसके कानों में पिघले शीशे की तरह उतर गई. उसे यकीन नहीं हो रहा था इतनी सौम्य, मासूम चेहरे वाली ‘धंधे वाली’ कैसे हो सकती है!
वो तो कितने सपने देख चुका था…
अच्छा! तो तुम मेरा कर्ज़ा उतारना चाहते हो.
उस लड़की के शब्द उसकी अंतरात्मा में चुभने लगे.
उसे क्या पता था कि वो लड़की उसके एहसास और ज़मीर पर कितना बड़ा कर्ज़ा रखकर चली गई है.
Rashmi ji adbhut
रश्मीजी, कहानी दिल को छू गई पूरी कहानी का दारोमदार अंत की पंक्तियों में सिमट आया है… मजबूरी में अपनी अस्मिता का सौदा करने वाली लड़की का ये पुरुष समाज कर्जदार ही तों है जिसे उतार पाना असम्भव है… मगर सोमेश का उसके प्रति अंत का नजरिया मन को नही भाया… कहानी लाज़वाब है 👌👌👌
जी आभार
जी आभार
वाह बेहतरीन, मन को झकझोरते वाली कहानी