वे बेचारे……

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जब वे गाँव की पाठशाला में पढ़ाते थे, तब ज्ञान की कितनी सारगर्भित बातें करते थे। हमें उन्हें सुनना अच्छा लगता था, पर न जाने ज़्यादातर लोग उन्हें क्यों नहीं सुनते थे। वे पेट्रोल-डीज़ल उपयोग करने वालों को पर्यावरण का शत्रु कहते, तो हमें स्वयं पर बड़ी ग्लानि होती—क्योंकि हम स्कूटी पर चलते थे। ऐसा लगा जैसे स्कूटी चलाकर हम प्रकृति के साथ अन्याय कर रहे हैं। अंततः हमने स्कूटी का परित्याग कर दिया और उनके थोड़े और क़रीब आ गए।

वे गाय का दूध पीते थे, शुद्ध शाकाहारी भोजन करते थे, चूल्हे का खाना खाते थे। गैस को प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग मानते थे। पर्यावरण की रक्षा को उन्होंने सर्वोपरि धर्म बना लिया था और पैदल चलते थे। हमने भी पैदल चलना शुरू कर दिया, क्योंकि हमें वे भगवान लगने लगे थे। जब मनुष्य भगवान बन जाता है, तब वह जो कहता है वही सत्य होता है।

उन्होंने कहा, “कार वालों को हिकारत की निगाह से देखो, ये प्रदूषण फैलाते हैं।”
हमने दिल से उनकी बात मानी। घर की कारों और उन्हें चलाने वालों पर हिकारत की दृष्टि डालना आरंभ कर दिया। और भी अधिक उनके क़रीब आ गए।

पर्यावरण पर बोलते हुए वे अक्सर रोने लगते थे। पेड़ों को भाई और प्रकृति को माँ कहकर वे सुबकते थे। उनके साथ हम भी रोते थे—क्योंकि उनके साथ रोना अच्छा लगता था। हमें लगा कि औरों को भी उन्हें सुनना चाहिए, रोना चाहिए। इसलिए हमने उनके भाषण सोशल मीडिया पर डालने शुरू कर दिए।

धीरे-धीरे वे दिखने लगे, छपने लगे, टी.वी. पर आने लगे। अब वे ज़्यादा भाषण (स्पॉन्सर्ड) देने लगे। गाँव की गोबर पुती कुटिया छोड़कर शहर के पॉश इलाके में आना पड़ा—हम उनके इस “त्याग” पर द्रवित हो उठे।

अब वे ‘गुरुजी’ नहीं, ‘पर्यावरणविद्’ कहलाने लगे। शिक्षा छोड़कर पर्यावरण रक्षा के “तुच्छ” कार्य में उतरना पड़ा। मजबूरी में अपना एन.जी.ओ. खोलना पड़ा। अब वे और भावुक हो गए हैं। पहले भी रोते थे, अब और ज़्यादा रोते हैं। और हम… अब उनके और भी ज़्यादा क़रीब आ गए हैं।

पेड़ों की ताज़ी हवा छोड़कर उन्हें ए.सी. और कूलर अपनाने पड़े हैं। पहले उनके बैंक अकाउंट में सन्नाटा था, अब उनमें भार है। वे हमें रोने की ज़िम्मेदारी देते हैं, लेकिन बैंक बैलेंस का बोझ अकेले उठाते हैं—क्योंकि वे महान हैं।

वे कितने त्यागी हैं—अब भी रोते हैं, अब भी भाषण देते हैं। शयनकक्ष के बाहर मधुमक्खियों ने छत्ता बना लिया था, पेड़ पर। बेचारे को वह पेड़ कटवाना पड़ा, नहीं तो मच्छर, मधुमक्खियाँ काटतीं और बीमार कर देतीं। फिर भाषण कौन देता?

शहद भी मजबूरी में बड़े आदमियों को भेजना पड़ा, नहीं तो पेड़ से संबंध बिगड़ जाता। अब वे विदेश भी जाते हैं—सरकार भेजती है तो जाना ही पड़ता है। बचपन से उन्होंने “मान” रखना सीखा है।

पहले पैदल चलते थे, फिर साइकिल, फिर टू-व्हीलर, अब मजबूरी में कार में बैठते हैं—भाषण बहुत हो गए हैं ना! कार पूल और पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सलाह देते हुए भी कार में बैठने का जो दर्द होता है, वो हम समझते हैं।

भाषणों के बाद बीएमडब्ल्यू और ऑडी में उन्हें चैन की नींद लेते देख, हमें बड़ा संतोष होता है। अब वे रोते भी “सोफिस्टिकेटेड” अंदाज़ में हैं। धोती-कुर्ता त्याग कर ब्रांडेड सूट पहनते हैं। उंगलियों में हीरे जड़ी अंगूठियाँ भी मजबूरी में पहननी पड़ती हैं—बड़े आदमी जो बन गए हैं।

अब वे जो कहते हैं, वही सत्य है। क्योंकि बड़ा आदमी झूठ थोड़े ही बोलता है। झूठ को भी सच बना देना उनकी कला है। और यही कला हमें उन्हें सुनने को बार-बार मजबूर करती है।

डॉ अलका अग्रवाल सिग्तिया
कहानी ,व्यंग्य ,कविता तीनों विधियों में लेखन|
कहानी संग्रह मुर्दे इतिहास नहीं लिखते महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के प्रथम पुरस्कार प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित|

व्यंग्य संग्रह -तेरी मेरी सबकी,मीरा_कूल| उपन्यास -अदृश्य प्रकाशित| कहानी संग्रह मुर्दे इतिहास नहीं लिखते| प्रैस में -“नदी अभी सूखी नहीं , परसाई का,, अखीन परसाई , लघु उपन्यास , फैन्स के इधर उधर, कविता संग्रह- खिड़की एक नई सी , कहानी संग्रह नदी अभी सूखी नहीं – |
निरंतरा स्क्रिप्ट, गोदरेज़ फिल्म फेस्टिवल में प्रथम|
फिल्म अदृश्य को राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड्स|
फिल्म,टेलीविज़न धारावाहिकों व रेडियो के लिए लेखन, स्तंभ लेखन व आने को पत्र पत्रिकाओं के लिए आलेख| हरिशंकर परसाई पर लघु शोध व प्रबंध, शोध|
लघु फिल्मों का निर्माण|
अध्यक्ष राइटर्स व जर्नलिस्ट्स असोसिएशन महिला विंग मुंबई
निदेशक परसाईं मंच, अध्यक्ष महाराष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय महिला काव्य मंच, राष्ट्रीय अध्यक्ष अंतरराष्ट्रीय वामा साहित्य अकादमी,बोर्ड मेंबर सी एफ बी पी|

संपादन- रंगक़लम अप्रतिम भारत,मुंबई की हिन्दी कवयित्रियां संगिनी|

सम्मान – महाराष्ट्र हिंदी साहित्य एकेडमी, दुष्यंत सम्मान,रचनाकार,आयेग(यू.के.) स्वस्थ भारत सारथी, आस्क सोसायटी सम्मान व्यंग्य यात्रा,नीरी, यादें बिस्मिल्लाह, कैरियर आफ्टर फैमिली,सी एफ बी पी, स्त्री शक्ति सम्मान, साहित्य रत्न सम्मान, महाराष्ट्र जागतिक महिला सम्मान, अंतरराष्ट्रीय महिला काव्य मंच का सम्मान आदि|

2 thoughts on “वे बेचारे……

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    – सुरेश परिहार

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