वह अफ़साना…

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)

उस रोज़ तबीयत कुछ नासाज़ सी थी, इसलिए काम जल्दी निपटाकर ऑफिस से निकल आई। अभी बिल्डिंग के बाहर कदम रखा ही था कि पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज़ ने ठिठकने पर मजबूर कर दिया।
​”मैडम, रुकिए!”
​मुड़कर देखा तो अश्विन सर थे। चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं और माथे पर चिंता की लकीरें साफ़ थीं। वो तेज़ कदमों से मेरे नज़दीक आए और दबी हुई आवाज़ में बोले, “अदिति मैडम, आपसे कुछ काम है।”
​मैं थोड़ी सकपकाई, “सर… आज थोड़ी देर हो रही है…”
​मेरा वाक्य अभी अधूरा ही था कि उन्होंने काटते हुए कहा, “मैडम, प्लीज़…”
​उनके स्वर में एक अजीब सी लाचारी थी, जिसे देखकर मैं आगे ना-नुकर नहीं कर सकी। अश्विन सर सिर्फ़ ऑफिस के सर्वेसर्वा ही नहीं थे, बल्कि एक बेहद सुलझे हुए इंसान भी थे। पार्टनरशिप में होने के बावजूद, ऑफिस की धुरी वही थे।
​वे तेज़ी से अपनी कार की तरफ बढ़े और ड्राइविंग सीट पर बैठने से पहले मेरे लिए आगे का दरवाज़ा खोल दिया। एक अजीब सी असमंजस की स्थिति थी। दिमाग में हज़ारों सवाल कौंध रहे थे, पर मैं चुपचाप जाकर अगली सीट पर बैठ गई।
​हम कहाँ जा रहे थे? क्यों जा रहे थे? इसका मुझे कोई इल्म नहीं था। मन में घबराहट का तूफ़ान उठ रहा था। सर ने गाड़ी भीड़भाड़ वाले रास्ते से निकालकर शांत यूनिवर्सिटी रोड की तरफ मोड़ दी। कार के भीतर पसरा सन्नाटा अब मुझे काटने को दौड़ रहा था।
​आखिरकार, मैंने हिम्मत जुटाई और पूछ ही लिया, “सर, आप मुझे कहाँ लेकर जा रहे हैं और बात क्या है? प्लीज़ बताइए।”
​अश्विन सर ने एक गहरी साँस ली। “मैडम, जो कहने जा रहा हूँ, समझ नहीं आ रहा शुरुआत कहाँ से करूँ। आप जानती हैं, यह बिज़नेस तो बस एक शौक था मेरा। जब से यह अकादमी शुरू हुई, आप और शिवानी मैडम जुड़े… हम सब एक परिवार की तरह रहे हैं। दिल्ली ट्रेनिंग के दौरान भी मैंने कभी बॉस होने का रौब नहीं दिखाया, हम दोस्त बनकर रहे…”
​जैसे-जैसे वो बोल रहे थे, मेरी धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। भूमिका बहुत लंबी खिंच रही थी।
​सर ने फिर कहा, “अदिति मैडम, यह बात मैं आपके सिवा किसी और से साझा नहीं कर सकता। मुझे नहीं पता आप मेरे बारे में क्या राय बनाएंगी। आप मेरी पत्नी और बच्चों से मिल चुकी हैं, सब कुछ ठीक चल रहा था… पर जब से शिवानी मैडम से मुलाकात हुई…”
​यहाँ आकर उनकी आवाज़ लड़खड़ा गई।
​”…पता नहीं क्यों, वो मुझे बहुत अच्छी लगने लगी हैं। दिन भर साथ रहते हैं, उनकी हर बात मन को भाती है। मैं जानता हूँ, मेरा ऐसा सोचना भी नैतिक रूप से गलत है, पर यह सब मैंने जानबूझकर नहीं किया। मैं शिवानी की फैमिली से भी मिला हूँ। अब उसकी माँ उसके लिए रिश्ते देख रही हैं और मैं… मैं अंदर ही अंदर घुट रहा हूँ। मुझे लगता है शिवानी के मन में भी मेरे लिए कुछ है, पर हम दोनों ही इस पर बात करने से डरते हैं।”

मुझे कभी-कभी कुछ महसूस हुआ था, की इन दोनों के बीच
“कुछ”तो है, लेकिन सर इस तरह अपनी मन: स्थिति का इजहार मेरे सामने करेंगे, यह मेरे लिए बहुत ही अप्रत्याशित सा था।
तभी मैंने अपनी उधेड़बुन से निकलकर सर की ओर देखा। उनकी आँखें डबडबा गई थीं। इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती, वो फूट-फूट कर रो पड़े।
​”मैं शिवानी के बगैर… नहीं रह सकता…” उनका दर्द आँसुओं के साथ बह निकला।
​उनकी हालत देखकर मैंने अपनी झिझक छोड़ी और सीधे मुद्दे पर बात करने का फैसला किया।
​मैंने गंभीरता से पूछा, “सर, आपने अपनी भावनाएं मुझसे साझा कीं, मैं समझ सकती हूँ। लेकिन आप आगे क्या चाहते हैं? क्या आप और शिवानी मैडम इस रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहते हैं? समाज ऐसे रिश्तों को किस नज़र से देखता है, यह आप मुझसे बेहतर समझते हैं। क्या आप अपनी हँसती-खेलती फैमिली को छोड़कर शिवानी मैडम के साथ नई दुनिया बसाने की हिम्मत रखते हैं?”
​वे चुपचाप मुझे देखते रहे, तो मैंने अपनी बात पूरी की, “सर, खुद से पूछिए। अगर इनमें से एक भी सवाल का जवाब ‘हाँ’ है, तो मैं आपको यही सलाह दूँगी कि आप अभी जाकर शिवानी मैडम से अपने प्यार का इज़हार कर दीजिए। परिणाम चाहे जो हो।”
​सर की खामोशी बता रही थी कि उनके पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। वे बस सिर झुकाए बैठे थे।
​मैंने नरम आवाज़ में आगे कहा, “लेकिन… अगर जवाब ‘ना’ है, तो सर… मैं आपकी वाइफ से मिली हूँ। आप लोग एक ‘हैप्पी फैमिली’ हैं। शिवानी मैडम और आप सिर्फ़ एक पड़ाव के साथी थे। उनकी शादी होगी, वो अपनी दुनिया में चली जाएंगी। लेकिन अगर इस बात की भनक भी आपके घर तक पहुँची, तो आपकी सुखी गृहस्थी में आग लग जाएगी।”
​थोड़ी देर रुककर, मैंने वही कहा जो उस वक़्त सबसे सही लगा.
​”वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन…
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना ही अच्छा है।”
तब तक अश्विन सर भी थोड़े संभल चुके थे, मैंने हंसते हुए अश्विन सर से कहा – सर अब चलिए ,प्लीज मुझे मेरे घर छोड़ दीजिए, अगर किसी ने मुझे यहां आपके साथ देख लिया तो एक नया “अफसाना” शुरू न हो जाए। मेरी बात सुनकर अश्विन सर भी मुस्कुरा दिए और गाड़ी मेरे घर की तरफ मुड़ गई ।

5 thoughts on “वह अफ़साना…

  1. बहुत ही सुन्दर रचना और आज के दौर पर सटीक की किस तरह से आप extra marital affairs se bache

  2. यह लेख एक अच्छे दोस्त को दिखाता है जो अपने दोस्त को सही सलाह देकर जिंदगी की सच्चाई से अवगत कराता है। बहुत बढ़िया मधु जी।

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