बिस्तर पर फैले कपड़ों की तरह
मैं रोज़ अपने रिश्तों को तह
करके रख लेती हूँ।
कभी किसी की शिकायत को मोड़ती हूँ
इस तरह कि उसकी सलवटें बाहर न दिखें,
तो कभी किसी की बेरुख़ी को
कपड़ों के बीच छुपा देती हूँ
जैसे पुराने रूमाल में आँसू छुपाए जाते हैं।
मैं अपनी मुस्कान को
साड़ी के पल्लू की तरह बाएँ कंधे पर संभालती हूँ,
और हर दिन की थकान
उस चुप्पी में बाँध देती हूँ
जो तकिए की सिलवटों में भी नहीं दिखती।
मैंने रिश्तों को धोया है
नम आंसुओं के पानी में,
सुखाया है धूप से ज़्यादा
सहनशीलता की रौशनी में।
और जब कभी कुछ फट गया
तो सी लिया है चुपचाप
अपनी आत्मा के धागों से।
हर तह
एक वादा है, एक समझौता, एक भूला गया जन्मदिन,
एक रूठा संवाद, एक बेमौसम त्योहार।
पर मैं उन्हें फिर भी तह करती हूँ ,
जैसे पुराने कपड़े जिन्हें कोई पहनता नहीं,
पर फेंका भी नहीं जाता।
कुछ रिश्ते कुरते जैसे हैं
बार-बार पहने जाते हैं,
थोड़े ढीले हो गए हैं अब,
पर उन्हें पहनकर मैं
अब भी सबसे “ठीक हूँ” कहती हूँ।
कुछ रिश्ते दुपट्टों जैसे
फिसलते हैं कंधे से,
पर माँ की तरह
मैं हर बार वापस उन्हें संभाल लेती हूँ।
और जब कभी
रात ज़्यादा लंबी हो जाती है,
तो मैं सोचती हूँ
क्या कोई है
जो मुझे भी कभी
इसी तरह तह करके
संभाले रखता होगा?
या मैं ही वो अलमारी हूँ,
जिसमें सब कुछ रखा जाता है,
पर जिसे कोई कभी खोलकर नहीं देखता ।

डॉ. ॠतु शर्मा नंनन पांडे, प्रसिद्ध साहित्यकार, नीदरलैंड
बहुत खूबसूरत भाव आपके
सच को खूबसूरत शब्दों में ढ़ाल दिया आपने🌹❤️
आपको कविता पसंद आई मेरा लेखन सार्थक हुआ । आपका ह्रदय से आभार 🙏
ऋतु जी , क्या लिखा है आपने ! रिश्तो की पेचीदगियों को जिस बारीकी से आपने शब्दों में बुना है, और कागज पर उकेरा है , निश्चित ही आप एक अनुभवों से समृद्ध महिला हैं।
बहुत खूब! बहुत सुंदर।
आपका ह्रदय से आभार । आपने मेरे मन के भावों को इतने अच्छे से समझा । पुनः सादर आभार 🙏🙏🙏🙏