रावण दहन

रीता मिश्रा तिवारी, प्रसिद्ध लेखिका भागलपुर

“बेटे जतिन..! चल आज मैं तुझे मेला दिखाता हूँ, जो तूने कभी देखा नहीं होगा ।”

“कैसा मेला दादू ?”

“अरे बेटा ! आज विजया दशमी है न तो रावण का दहन होता है।”

“ये रावण कौन है? दहन क्या होता है दादू..?”

जतिन बचपन से ही अमेरिका में अपने मां पापा के साथ रहता था। एक दिन कार एक्सिडेंट में उसके मां पापा की मृत्यु हो गई तो दस साल के जतिन को वापस भारत अपने घर रांची दादू के पास आना पड़ा । जतिन और उसके दादू अब अकेले रहते हैं।

” बेटे..! रावण दहन का अर्थ है बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी को हम रावण को जलाकर मनाते हैं।”

“क्यूं जलाया जाता है उन्हें क्या वो बहुत बुरे व्यक्ति थे।”

“बेटा..! रावण ब्राह्मण था.. राक्षस कुल का होने के बावजूद वो प्रकांड विद्वान और बहुत बड़ा शिवभक्त भी।
बेटे..! पहले से ही सब कुछ निर्धारित होता है और ये सब नियति तय करती है की कब क्या होगा। रावण का जलना निश्चित था।
आज तुझे रावण दहन की ईश्वरीय लीला को बताता हूँ।
सुन…
लंका के युद्ध में ब्रह्मा जी श्री राम से रावण वद्ध के लिए देवी दुर्गा पूजन कर देवी दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए कहा।
उनके बताए अनुसार चंडी पूजन और हवन हेतु दुर्लभ १०८ नील कमल की व्यवस्था की गई ।
वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरता के लोभ में विजय कामना से चंडी पाठ और पूजन किया।यह बात इंद्र देव ने पवन देव के माध्यम से श्री राम तक पहुंचाई और परामर्श दिया कि चंडी पाठ यथासंभव पूर्ण होने दिया जाय।

इधर हवन सामग्री में से पूजा स्थल से एक नीलकमल रावण की मायावी शक्ति से गायब हो गया , और राम का संकल्प टूटता नजर आने लगा।भय इस बात का था कि कहीं देवी मां रूष्ट न हो जाय।नीलकमल की व्यवस्था तत्काल असंभव था।
तब भगवान श्री राम को स्मरण हुआ कि लोग मुझे “कमल नयन नव कंच लोचन” कहते हैं , तो क्यों नहीं संकल्प पूर्ति हेतु एक नेत्र अर्पित कर दिया जाय , और जैसे ही श्री राम ने तुनीर से वाण निकाल कर अपना नेत्र निकालने के लिए तैयार हुए तभी देवी दुर्गा माँ प्रकट हुईं और कहा कि..

“”हे राम ! मैं तुमसे प्रसन्न हूं , विजयश्री का आशिर्वाद देती हूँ।””
तथास्तु कह कर देवी दुर्गा अंतरध्यान हो गईं।उधर रावण के चंडी पाठ में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों की सेवा में ब्राह्मण बालक का रूप धरकर हनुमानजी सेवा में जुट गए।निःस्वर्थ सेवा देखकर ब्राह्मण ने हनुमान से वर मांगने को कहा।
इसपर हनुमान जी ने विनम्रतापूर्वक कहा-“प्रभु आप हम पर प्रसन्न हैं तो जिस मंत्र से यज्ञ कर रहे हैं उसका एक अक्षर मेरे कहने से बदल दिजिए।”

ब्राह्मण इस रहस्य को समझ न सके और तथास्तु कह दिया।मंत्र में “जयादेवी भूर्तिहरिनी में “ह “के स्थान पर “क “उच्चारित करें यही मेरी इच्छा है।र्तिहरिणी यानि की प्राणियों की पीड़ा हरने वाली और करणी का अर्थ हो गया प्राणियों को पीड़ित करने वाली ।

जिससे देवी रूष्ट हो गईं और रावण का सर्वनाश हो गया।हनुमानजी महाराज ने श्लोक में “ह”की जगह “क “करवा कर रावण के यज्ञ की दिशा ही बदल दी । बेटे.. ! यही है रावण दहन की वजह की कथा.. सीता हरण तो एक मात्र बहाना था। इसीलिए प्रत्येक वर्ष विजया दशमी के दूसरे दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न रावण को जलाकर मनाया जाता है।”

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