मौन..

बहुत सौभाग्यशाली होते हैं वे जिन्हें मौन का वरदान मिला हुआ है।
जब मन, शरीर और आत्मा तीनों की स्थिति एकसमान होती है, यानी एक लय में होती है, तब मौन का जन्म होता है।

अध्यात्म में मौन का बहुत ही महत्व है। यह वह दरवाज़ा है जिसके खुल जाने से ब्रह्मांड की कई शक्तियों से हम परिचित होते हैं। लेकिन इसके लिए हमें मौन में रहने का अभ्यास करना पड़ता है, सिर्फ वाणी से नहीं बल्कि विचारों से भी।

मन-मस्तिष्क में रोजाना हजारों विचार उत्पन्न होते हैं। बहुत बार हम शारीरिक क्रिया से नहीं थकते, लेकिन मन में विचारों के उथल-पुथल से, बिना कुछ किए भी, लगता है मानो हममें कोई शक्ति ही न बची हो। इसका भी वैज्ञानिक कारण है—विचार भी तरंग की तरह होते हैं, जो लगातार प्रवाहित होते रहते हैं। जितने अधिक विचार उत्पन्न होंगे, उतनी ही हमारी ऊर्जा नष्ट होती है, और इससे हमारी निर्णय क्षमता भी प्रभावित होती है।

इसे इस तरह भी समझा जा सकता है—जैसे किसी तालाब के पानी में हम जब कंकड़ फेंकते हैं, तो जल तरंगित हो उठता है और उसमें लहरें पैदा होती हैं। जितना ही पानी तरंगित होगा, हम तालाब की गहराई में नहीं देख पाएंगे। और जब तालाब का पानी शांत और साफ होगा, तो उसके तल तक भी हम साफ देख पाएंगे।

इसी प्रकार, हमें अपने मन-मस्तिष्क से नकारात्मक विचारों रूपी कचरे को हटाकर सकारात्मक विचारों से मन को उर्जावान और शांत रखना चाहिए। इससे हमारी बौद्धिक क्षमता का भी विकास होता है और मन के अंदर खुद को व परमसत्ता को भी हम जान सकते हैं।

ब्रह्मांड के कई राज खुलते हैं और मन की परतों के पीछे छुपी कई बातें हम जान सकते हैं।

लेकिन यह एक दिन में नहीं होता। बहुत लोग कहते हैं कि उनका ध्यान नहीं लगता। इसके लिए रोज़ मन को विचारों से खाली कर किसी एक चीज़ पर, जो आपको पसंद हो—चाहे वह आपका इष्ट हो, कोई फूल, जंगल, समुद्र या कोई अन्य वस्तु—मन को एकाग्र कर, शांत और विचार-शून्य करने की कोशिश करें।

यकीन मानिए, धीरे-धीरे बहुत सुखद अनुभूति होगी और बहुत तरह के अनुभव होंगे।

अर्चना मिश्रा, प्रसिद्ध लेखिका, बोकारो

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