
प्रीति राही, प्रसिद्ध लेखिका, बैंगलोर
सूखी लकड़ी हूं मैं वन की,
जीवन में हूं हितकारी।
आदि-अन्त का भेद नहीं है,
मैं ही हूं तारणहारी।
कालचक्र विश्राम हूं मैं।
पग-पग पर कल्याण हूं मैं।
मैं हूं सूखी लकड़ी।।।।।
घिस कर शिव के मस्तक पर सजती,
वो मैं लकड़ी चंदन की।
मैं अनंत की सत्य स्वामिनी,
मैं महिषी हूं वन उपवन की।
अविनाशी की शान हूं मैं।
पग-पग पर कल्याण हूं मैं।
मैं हूं सूखी लकड़ी।।।।
कहते हो मैं बांस खोखली,
किन्तु बांसुरी भूल गए।
कृष्ण के अधरों की मुरली,
नेह हिंडोले झूल गए।
उस वंशी की तान हूं मैं।
पग-पग पर कल्याण हूं मैं।
मैं हूं सूखी लकड़ी।।।।
कहते हो निष्प्राण मुझे पर,
मैं राधव का वंदन हूं।
रघुनंदन के कांधे पर सजता,
पावन पुण्य शरासन हूं।
उस रघुकुल का मान हूं मैं।
पग-पग पर कल्याण हूं मैं।
मैं हूं सूखी लकड़ी।।।।
खाट बने या पाट बने,
या नरेश का सिंहासन।
हूं हरी-भरी तो जीवन है,
फिर ऋषियों का कुश आसन।
हृदयों में बसता प्राण हूं मैं।
पग-पग पर कल्याण हूं मैं।
मैं हूं सूखी लकड़ी।।।।
सुरसरिता की धारा को,
नैया बन कर मैं करूं पार।
डूब रहा वो तिनका चाहे,
तब मैं बनती हूं पतवार।
जीवन का वरदान हूं मैं।
पग-पग पर कल्याण हूं मैं।
मैं हूं सूखी लकड़ी।।।।
वेदों में वर्णित जो रथ है,
उसका तो आधार हूं मैं।
वैद्य औषधी मानें मुझको,
रोगी का उपचार हूं मैं।
आशा का संज्ञान हूं मैं।
पग-पग पर कल्याण हूं मैं।
मैं हूं सूखी लकड़ी।।।।
सावन में झूले पड़े डाल पर,
या शिशु का छोटा सा पलना।
हर घर की चौखट में मैं हूं,
वातायन में मेरा ढलना।
सुंदर सत्य प्रमाण हूं मैं।
पग-पग पर कल्याण हूं मैं।
मैं हूं सूखी लकड़ी।।।।।