
विजयलक्ष्मी सिंह, कवयित्री
मुरलीधर की मुरली कहती,
तुम प्रेम-भक्ति में मगन रहो।
किस हेतु जन्म तुमने पाया,
पावन विचार ये मनन करो।
ये कर्मभूमि सत्कर्म करो,
चर और अचर का ध्यान धरो।
धन-दौलत आनी-जानी है,
यह सत्य मानकर मगन रहो।
मुरलीधर की मुरली कहती,
तुम प्रेम-भक्ति में मगन रहो।
संयम, धीरज तुम सदा धरो,
निष्पक्ष धर्म की बात करो।
जीवन संघर्षों में, चलकर
कुछ सुंदर मार्ग प्रशस्त करो।
निज आत्म-विवेचन कर-कर के,
हो दृढ़ प्रतिज्ञ, तुम मगन रहो।
मुरलीधर की मुरली कहती,
तुम प्रेम-भक्ति में मगन रहो।
विद्या अमूल्य धन प्राप्त करो,
जीवन सम्मत व्यवहार करो।
संयम, अदम्य साहस से निज संघर्षों का व्यवधान हरो,
इसका न क्षरण तुम करो कभी।
संस्कृति के सहोदर मगन रहो,
मुरलीधर की मुरली कहती,
तुम प्रेम-भक्ति में मगन रहो।
निर्बल-दुर्बल सब साथ रहें,
सद्भाव सदा सबमें पनपे।
तुम साथ सत्य का ही देना,
ये बात हमेशा याद रहे।
धरती का संवरण ध्येय बने,
बन प्रकृति सहोदर मगन रहो।
मुरलीधर की मुरली कहती,
तुम प्रेम-भक्ति में मगन रहो।
मुरलीधर की वंशी का बहुत सुंदर प्रासंगिक आह्वान। हार्दिक बधाई आदरणीया।
बहुत सुंदर भावपूर्ण सृजन आदरणीय 👌👌👌 हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 👏💐💐❤️