माटी का इंसान

नमिता गुप्ता ‘श्री’

सारे जग में ढूंढ रहा तू एक सच्चा इंसान।
माटी का इंसान बना है, पत्थर का भगवान।।

अच्छे-बुरे की गिनती करता वह दिन-रात,
खुद को तौल सके पैमाना रहा मूर्ख, नादान।।

बचपन बीता, बीती जवानी, देख बुढ़ापा रोया—
जोड़-घटाना किया सदा, भूली मीठी मुस्कान।।

जो पाया, छूट गया; आगत का सामर्थ्य नहीं।
उड़ने की तैयारी है, परे हट, टूट रहे अरमान।।

इंसा बनकर ही हम इस दुनिया में हैं आए,
इंसानियत भुला चुका, खोया अपना ईमान।।

मां का आँचल छोड़कर जो चले गए परदेस
देख रूपहली चमक वहाँ की, भूला मां-मान।।

अपनी धरती है घर-वैभव, अपनी ऊँची शान
चाटता औरों के तलवे, श्री भूल गया सम्मान।।

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