मन 

रिश्तों पे चढ़ी हुई 

खामोशी की परत 

मन को किसी गहरे निर्जल 

कुंए में ,

धकेल देती है ।

छा जाती है आकुलता 

और विकलता 

जहाँ नहीं होती कोई चाहत 

व उम्मीद ,

नव पल्लव विकसित होने की ।

मन के किसी सुदूर कोने में 

धरी रह जाती है ,

आशा और अभिलाषा 

सुंदर सी यादों की ,

पोटली बनकर ।

हर अहसास पिघल कर 

बन जाते हैं ,

पतझड़ का मौसम

और फिर बांझ बन फट पड़ती है 

ये धरा सा मन ।

अर्चना मिश्रा, अश्क, प्रसिद्ध लेखिक, बोकारो (झारखंड)

3 thoughts on “मन 

    1. वाह, पतझड का मौसम बांझ बन फट पडती है,,, मन के किसी कोने को झकझोरने वाली रचना

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