कविताएं
समझती हैं
सह-जीविता की परिभाषा
ठीक वैसे ही
जैसे फूलों ने समझा मधुमक्खियों को
जंगल ने समझा कवक और शैवालों को।
कविताओं ने
कभी खदेड़ा नहीं,
आंचलिक भाषा में
अंग्रेज़ी को चमत्कृत होते,
न ही खड़ी बोली ने
कोई राग छेड़ा
अरबी-फ़ारसी का वो साथ छोड़े,
कविताओं ने
मेरी गंवई बोली को सरहदें
लंघाई।
कविताएं
बोती हैं संस्कृति
और
फैलाती हैं बीज
‘हमारी भाषा का तुम्हारी भाषा में’।
कविताएं
रोकती नहीं
भाषांतर
वो जानती हैं
आंचलिक भाषाओं की पहुंच
और सीमान्तों में चेतना का महत्व।
कविताएं
तोड़ देना चाहती हैं
भाषावाद में गड़े विष-दंश को
वो चरवाहे की भाषा के गीत
लालकिले से सुनाना चाहती हैं,
वो चाहती हैं मछुआरों के गीत
गुनगुनाते मिले कोई फिरन वाली,
वो चाहती हैं मजदूर का प्रोटेस्ट
सात समंदर पार भी सुनाई दे,
इसीलिए
उन्होंने कविता की सरहद से
भाषा के सिपाहियों को निलंबित कर दिया है ।
मेरे राज्य की भाषा
मेरी मां की बोली से अलग है
मां की बोली ने मुझे वाक्-पटु बनाया है,
राज्य की भाषा ने दुनिया मेरे सामने खोली है,
एक वैकल्पिक भाषा भी
अपनी कविताओं में मर्सी का भाव जगाती है,
वही मेरी कार्ल मार्क्स से भेंट कराती है।
कविताएं
समझ गईं हैं
नैतिकता में सह-जीवन और वैविध्य का अस्तित्व
और
वो जानती हैं
भाषाएं ही मिलकर बनाएंगी
विचारों को दीर्घकालिक,
भाषाएं ही खोलेंगी द्वार
शांति और सुरक्षा के,
भाषाएं ही जगाएंगी सौहार्द
पूरब और पश्चिम में,
भाषाएं ही जीवित रखेंगी
मूल्य, मानवता और इतिहास।

अंजू सुंदर, असिस्टेंट प्रोफेसर और प्रसिद्ध कवयित्री, लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
बहुत खूबसूरत
आत्मीय आभार संपादक महोदय 💐
बहुत सुंदर वर्णन है भाषा का , भाषा के माध्यम से कई मुद्दो पर प्रकाश डाला है।