
अंजू शर्मा वशिष्ठ, लेखिका एवं शिक्षिका, करनाल, हरियाणा
जाने कहां गए वो दिन
जब बच्चे मां के आंचल में छांव ढूंढते थे,
पिता की बातों में जीवन का ज्ञान ढूंढते थे।
गलियों में मैदानों में खेल की राह ढूंढते थे,
दादी नानी की कहानियों में आनंद ढूंढते थे।
जो कभी प्रणाम से दिन की शुरुआत करते थे,
आज वे हेलो हाय से बात शुरू करते हैं।
कभी माता-पिता की बात को सर झुकाते थे,
आज वे मां की ममता को हल्का समझते हैं।
आज नज़रें झुकी हैं किताबों पर नहीं,
मोबाइल की स्क्रीन पर टिक गईं कहीं।
आज खेल के मैदान खाली हो गए सभी,
गेम्स की दुनिया में बच्चे खो गए कहीं।
ना पहले सा सम्मान, ना वही प्यार,
मां बाप की सीख लगती है बोझ बार-बार।
बड़ों की सीख पर करते हैं तकरार,
भूल गए हैं बच्चे सारे संस्कार।
पढ़ाई का दीपक बुझता नजर आता है,
सपनों का आंगन सिमटता नजर आता है।
माता-पिता की आंखों में हैं सवाल हजार,
क्यों बदल रहा है यह बच्चों का व्यवहार।
फिर भी उम्मीद की किरण बाकी है यहां,
संस्कारों की धारा बहती है वहां।
अगर प्यार से समझाएं माता-पिता हर बार,
तो फिर जगमगाएंगे बच्चों के संस्कार।
सही लिखा आपने अंजु जी।