
जिज्ञासा सिंह, (पर्यावरण प्रेमी, साहित्यकार एवं ब्लॉगर), लखनऊ
आसमान को छू रहा, ऊँचा खड़ा विकास।
पशु-पक्षी बेघर हुए, खोजें निज आवास।।
प्लॉटिंग के बाज़ार में, बिकते चारागाह।
घर-घर छुट्टा जानवर, व्यापारी की वाह।।
उमड़-घुमड़ रोती रही, बदली नभ में आज।
सर, सरिता और कूप के, बैरी करते राज।।
मेढ़क प्यासा ढूँढ़ता, अपना खोया कूप।
कंकड़-पत्थर हैं वहाँ, बदल गया हर रूप।।
खड़ी तलैया रो रही, पोखर जी के द्वार।
गंगा तो सुथरी हुई, अपना कब उद्धार।।
कटी नीम की आग में, हाथ सेंकती भीड़।
गौरैया आयी नहीं, राह देखता नीड़।।
चूनर ओढ़े श्रावणी, मन में भरे उमंग।
बादल जी आये नहीं, उड़ा धूप में रंग।।
आज बहुत गद्गद हुई, पुश्तैनी तब नीम।
हँसकर जब सूखा कुआँ, लगा बनाने मीम।।
पीढ़ी दर पीढ़ी फला, बाबा जी का बाग।
सड़क उसी की शाख़ से, लगा रही अब आग।।
जंगल-जंगल फल रहा, आरी का व्यापार।
चिड़िया घर-घर घूमकर, माँग रही अधिकार।।
धुंध हवाओं में घुली, जा बैठी है श्वाँस।
दमा, अस्थमा चल पड़े, डॉक्टर जी के पास।।
आखेटक के म्यान से, झाँक रही एक मूँठ।
टुकुर-टुकुर तकती उसे, जड़ थामे एक ठूँठ।।
उमड़-घुमड़ रोती रही, बदली नभ में आज।
सर-सरिता और कूप के, बैरी करते राज।।
युद्धों के मैदान ने, लिखा जो इतिहास।
पर्यावरण असंतुलन, उसमें सबसे ख़ास।।
सारगर्भित चित्र के साथ,
मेरी रचना को पोस्ट करने के लिए आपका बहुत आभार।