पिता और पढ़ाई

यूं तो पिताजी अध्यापक रहे

वो भी गणित के

लेकिन हमें वे 

साल में एक आध बार ही पढ़ाने बैठते

जैसे ही वे कुछ लिख कर समझाने के लिए पेन मांगते हम कांपते हाथों उनको 

अपना पेन पकड़ा देते 

यही वक्त होता जब 

अच्छे से अच्छा पेन भी चलने से मुकर जाता, 

धैर्य पूर्वक पिता दूसरे पेन के लिए हाथ बढ़ाते, हमारी किस्मत खराब, अच्छी 

या न जाने कैसी कैसी 

कि दूसरा पेन भी 

दो शब्द के बाद रुक जाता, अफरातफरी में कहीं से ढूंढ ढांढ कर तीसरा पकड़ाया जाता 

ज़ाहिर है वह भी न चलता और पिता आपा खो 

कॉपी पेन फेंक देते…

हम कॉपी उठाते, संभालते, सहेजते घबराए से उनकी नजरों से दूर हो जाते

इस तरह अगले लगभग एक वर्ष के लिए पिता द्वारा पढ़ाए जाने से बच जात

2

पिता जी जब

मां द्वारा 

अच्छे से इस्त्री की गई

अपनी सफ़ेद कमीज़ 

और स्लेटी पेंट, 

सफ़ेद जुराब, काले बूट पहन 

बढ़िया से तैयार हो 

स्कूल के लिए निकलते 

तो चलने से पहले उन्हें अपना पेन लेने का 

ध्यान आता, 

जो सारे घर द्वारा 

सारे घर में ढूंढे जाने पर भी, कभी न मिलता…

पिता को हमेशा शक रहता कि उनके खरीदे तमाम नए पेन हम खिसका लेते हैं…

3

पिता जब पढ़ाने की शुरुआत करते, बड़े ही प्रेम से कहते

बेटे एक बार में समझ न आए तो दोबारा पूछा करो

दो बार में भी समझ न आए तो तीसरी बार पूछा करो

जब तक कि सवाल 

समझ में ना आ जाए

बार बार पूछा करो

उनकी बात से प्रभावित हो

कक्षा दस में

एक बार मैं उनसे तीसरी दफ़े

‘ लाभ हानि ‘ का

सवाल समझने पहुंच गई

उस दिन अपने जीवन में पहली और 

आख़िरी बार 

मैंने दो थप्पड़ खाए

इस घटना के परिणामस्वरूप 

एक बढ़िया बात हुई कि 

जीवन में आगे कभी

लाभ हानि के बारे में सोचा ही नहीं।

4

पिता जी में बहुत से अजीबोगरीब गुण थे

उनके भुलक्कड़पन के किस्से मशहूर थे

पिता स्कूल जाने की जल्दी में नहाते वक्त अक्सर बनियान पहने पहने ही बदन पर पानी डाल बैठते 

बाद में चौंकते 

कई बार वे इतवार के दिन

बन ठन कर स्कूल पहुंच जाते

चौकीदार जब मुस्कुराते हुए उन्हें याद दिलाता तो वे 

ऐसा अभिनय करते मानो

मॉर्निंग वॉक के लिए आए हों।

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पिता की विद्वत्ता के उदाहरणों के साथ साथ

आलस के भी

किस्से सुनने में आते थे

उनके बचपन की

घटनाएं हम दांतों तले

उंगली दबाए सुनते थे… 

वे पढ़ाई में बहुत तेज़ थे

कविताएं भी 

क्या ख़ूब करते थे

एक बार जब उनसे

मैने सवाल किया डैडी

आपने पढ़ने के लिए 

गणित ही क्यों चुना

तो वे जम्हाई लेते 

अलसाते हुए बोले

बेटे इसमें 

लिखना कम पड़ता है…

दीप्ति सारस्वत, वरिष्ठ साहित्यकार, शिमला

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