
राकेश चंद्रा, प्रसिद्ध साहित्यकार, लखनऊ
नील गगन की छाँव में,
हरीतिमा की गोद में, मैं सिमटी खड़ी हूँ
एक वृक्ष का अवलंब लेकर,
सदियों से प्रतीक्षारत
अपने चितचोर की तलाश में।
अपलक देखती हूँ मैं आँखें बिछाए,
और सुन रही हूँ पदचाप की आहटों का शोर,
ज़माने गुज़र गए हैं उसके आने की चाह में;
एक प्यासी नदी, रस-तिक्त भी है जो,
कि लुप्त हो चुकी अमृत-सरीखी
एक रसधार बन चुकी हूँ मैं।
वह आएगा ज़रूर, इतना-सा ख़्वाब है,
इतने समय के बाद भी मेरी आँखों में ताप है,
मन को न रीता कर सका विगत
पतझड़ों का वार।
वह आएगा ज़रूर हवाओं के वेग से,
इसलिए खड़ी हूँ मैं देहरियों के पार।
वाह !!
बेहतरीन…
हार्दिक धन्यवाद!
बहुत ख़ूब
हार्दिक आभार!