तेरी बिंदिया रे…..

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)

तेरी बिंदिया रे…….

देख कर उसकी छोटी-सी बिंदिया,
उड़ जाती है मेरी रातों की निंदिया।

ना किया तिरछी निगाहों का वार,
ना करती है वह मुझसे नज़रे चार।

सादा उसका भोला-सा मुखड़ा,
लगे जैसे चाँद का कोई टुकड़ा।

क्या ही कहूँ और कैसे कहूँ मैं,
देखूँ तुझे बस, और देखता रहूँ मैं।

चली आओ, मान रख लो मेरा,
क़यामत में भी साथ दूँगा तेरा।

ना मेकअप, ना लाली — बस एक बिंदी,
सुंदर से चेहरे पर जमी, एक बिंदी।

चला भी जाऊँ इस जहाँ से अगर मैं,
चेहरे से तेरे बिंदी को हटने न दूँ मैं।

तेरी बिंदिया रे…

7 thoughts on “तेरी बिंदिया रे…..

  1. पति की नजर से बिंदिया की सुंदर प्रस्तुति

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