तुम “तारा” हो

सुरभि ताम्रकार, नवोदित कवयित्री, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

तुम “तारा” हो
तुम तारा हो, मेरे आकाशगंगा की।
जो मेरे ख्वाहिशों के लिए टूटने को तैयार रहती हो।
तुम वो टूटता तारा हो, जो बार-बार टूटकर भी टिमटिमाती रहती हो।

कभी खुद की ख्वाहिशों को तोड़कर,
कभी मेरी पसंदीदा चीज़ के लिए अपनी बचत के पैसे तोड़कर,
या कभी अपना वक्त, मेरे लिए… सिर्फ़ मेरे लिए छोड़कर।
अपने प्रकाश से प्रकाशित होती रहती हो।
और बिखर कर भी खुशी-खुशी तारा ही बनी रहती हो।

तुम तारा हो, मेरे आकाशगंगा की।
मेरे ख्वाहिशों के लिए टूटने को तैयार रहती हो।
कभी मेरी काली अंधियारी रात में जगमगाने का ज़िद करती हो,
या किसी टूटते तारे को दिखा कर सपने सच होने का साहस देती हो।

तुम तारा हो, मेरी आकाशगंगा की,
जो जीवन के अंतिम काल तक खुद को तोड़ती रहोगी,
ताकि मेरे ख्वाहिश हर बार पूरी होती रहें।
और हर बार मैं भरोसा कर सकूँ कि मैं भी औरों के लिए तारा बन सकूँ।

तुम तारा हो, मेरे आकाशगंगा की।
तुम “तारा” हो।

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