
मधु झुनझुनवाला, प्रसिद्ध लेखिका, जयपुर
अँखियाँ हैं भरी-भरी, स्मृतियों से हुई हरी,
विछोह की पीर धरी, ढूँढें माँ की छाँव है।
देहरी ये सूनी लगी, रहती थी नेह पगी,
मातु बिन आँगन में, मिले नहीं ठाँव है।
मौन हुए आज नैन, खोये वो मृदुल बैन,
छूने को मचले मधु, ममता के पाँव है।
श्रद्धा के पावन दिन, गुजरें हैं गिन-गिन,
बस गया अंतस में, सुधियों का गाँव है .
छाँव ढूँढें बचपन
बाबूजी की स्मृति छूटी, भावों की लड़ियाँ टूटी,
अबोध मुस्कान लूटी, बहे अश्रु धार है।
छाँव ढूँढें बचपन, नित्य तपाती तपन,
झरे नैनों से सपन, मन गया हार है।
बीत जाते दिन-रात, दिखे नहीं कहीं तात ,
लिख भेजूँ कहाँ पात, मिले नहीं द्वार है।
थामें कान्हा पतवार, वही तो खेवनहार,
मधु कहती पुकार, उन्हीं से संसार है ।।
मधु जी ,
भोले बचपन का सुरक्षित छांव ढूंढना एक कठिन स्थिति है।
बाबूजी की स्मृति छूटी, भावों की लड़ियाँ टूटी,
अबोध मुस्कान लूटी, बहे अश्रु धार है।
छाँव ढूँढें बचपन, नित्य तपाती तपन,
झरे नैनों से सपन,
बचपन की अपूर्ण खोज का आपने बहुत मार्मिक वर्णन किया है.
बधाई स्वीकार कीजिए ।