मैंने डिब्बे वालों को देखा था, मुम्बई के रेलवे स्टेशनों पर
सफेद पायजामा, सफेद कमीज, सिर पर लकड़ी की छाबड़ी
वे ले जाते थे, भूख को यहां से वहां, वे स्कूल नहीं गए थे
गुणा भाग भी नहीं सीखा, लेकिन हार्वर्ड उन पर शोध करती थी
जब बाढ़ आई मुम्बई में, ये डिब्बे वाले थे
लंच बाक्स पिक्चर बन कैसे जाती यह जो नहीं होते
वे ऐसे ही लुप्त हो गए, जैसे हो गए थे मिल मजदूर
जब कि कुली फिल्म का हीरो, आज शहंशाह बना बैठा है
मैं अक्सर सोचती हूँ कि क्या करते होंगे ये डिब्बे वाले?
बिना किसी आमदनी के क्या खाते होंगे?
उनकी कमीज कितनी मैली हुई होगी?
सब की भूख का हिसाब रखने वाले, अपनी भूख को
कैसे दबा कर रख पाते होंगे?
एक बीड़ी को जमीन पर तीन बार रघड़ते हुए
इतिहास भी नहीं बन पाए,
कैसे रहते होंगे डिब्बे वाले?

रति सक्सेना, वरिष्ठ साहित्यकार,जयपुर
इन्हीं साधारण लोगों से दुनिया खूबसूरत है। अच्छी रचना ,Rati saxena जी की।