कविता वर्मा के कहानी संग्रह “तस्वीर जो नहीं दिखती“ की समीक्षा
समीक्षक -डॉ. शोभा जैन
हम उस समाज का हिस्सा हैं जिसने परम्पराओं और व्यापक
सामाजिक कुरुतियों की चौँधियाती रोशनियों तले बिसूरते अंधेरों को अछूता रखा है.एक ऐसा समाज जहाँ सुखी-परिवार होने के पैरामीटर समाज निर्धारित करता है.
जीवन की जटिलताओं से जूझता कविता वर्मा का कहानी संग्रह -तस्वीर जो दिखती नहीं ऐसे समाज का अनुशीलन है जिसमें स्त्रियोचित गुणों (कोमलता, सहिष्णुता, त्याग, क्षमा, दया, समर्पण -समायोजन ) को प्रासंगिक और वैध मानने का तर्क पुरुष सापेक्ष स्थिति के पक्ष में जाता है. इसलिए इन कहानियों को पढ़ते हुए स्त्री अस्मिता का विमर्श बराबर बना रहा.
संग्रह की कहानी शीशमहल जीवन में एक बड़ी कमी होने पर रिश्ते कितने पूरक हो सकते हैं इस मनोविज्ञान को समझने का पर्याप्त अवकाश देती है.
कहानी किसी परम्परागत शैली से इतर द्वन्द और सवालों की मुद्रा में कट -टू -कट चलती है. कहानी में एक किस्म की उपेक्षा का मर्दवादी चक्रव्यूह है जिसमें सामाजिक संरचना विस्तार पाती है. कथानक में कहीं -कहीं तर्क संगत वैचारिक उद्वेलन के संकेत मिलते हैं जहाँ लेखिका बहुत कुछ कह सकती थी जिसे बचा लिया. पाठकों के लिये वह संवाद किसी जिज्ञासा के आवरण में स्त्री को कामधेनु के खूंटे में बांध देने का जतन लगा.मसलन : बेटी टीना के मन में उठता प्रश्न
क्या बच्चों का होना इतना जरुरी था?
मम्मी ने कहा था आप की (पापा ) की सहमति से हुआ (पेज नंबर17)
कहानी की विषयवस्तु एक ओर स्त्री विमर्श के दबे हुए खोह को कुरेदती है जिसमें पात्र का आंतरिक संघर्ष एक ऐसी स्त्री का है जो विशुद्ध गृहिणी नहीं.
जीवन में अपने लिये निर्णय लेने का विकल्प होने के बावजूद समाज के लिये, परिवार के लिये उस व्यवस्था को बनाये रखना जिसमें उसकी अस्मिता की प्रतिरोध शक्ति प्रतिदिन क्षीण होती है., निश्चित ही अलग रास्तों के चयन की नैतिक मजबूरी किसी भी हाशियाग्रस्त अस्मिता को यातना के दुष्चक्र से मुक्त नहीं करती, लेकिन अपने हक की लड़ाई में योद्धाओं की लंबी दास्तान का एक हिस्सा जरुर बन जाती है.
शीशमहल कहानी कुछ ऐसा ही निष्कर्ष लेकर पाठकों के लिये देती है.
कहानी आज के परिदृश्य में अबाध्य अधूरेपन के साथ आगे बढ़ती है पिता की चुप्पी में माँ की उपस्थिति बेटी टीना के भीतर जिस वैचारिक द्वन्द को समेटती है वहीं कहानी के एक संवाद में विचार सूत्र फूटता है
*कुछ चीजें इतनी विकृत हो जाती है कि उन पर हमेशा पर्दा पड़ा रहे यही अच्छा है. (पेज नंबर 21)
पापा का होकर न होना पापा के न होने से ज्यादा मुश्किल है (पेज नंबर17)
कहानी के मूल सत्व में यही है कि पुरुष के संवेदनात्मक सरोकारों की दुनिया में स्त्री का स्थान तब तक ही सुरक्षित है जब तक स्त्री स्वयं उस अंधेरी सीलन भरी तंग ग़ालियों में रहना स्वीकारती है.शीशमहल कहानी का निष्कर्ष बहुत गहरा प्रश्न लेकर उभरता है-
स्त्री की अंतर्निहित दुर्बलताओं के कारण आकार लेती परिणतियों का परिणाम उन्हें भोगना है तब तक जब तक क्रूर निर्णायक स्थिति नहीं होती
टीना की माँ ऐसी ही स्थिति से ग्रस्त है.
माँ को तौलती बेटी (टीना )जो स्वयं भी एक माँ है के मानस में अपने माता -पिता के बेरूखे संबंधों को लेकर, अपने पिता की अपने प्रति अजनबीयत के चलते जो प्रश्न उभरे वही प्रश्न पाठकों को भी उद्वेलित करते हैं और यही इस कहानी की सफलता है.
संग्रह की कहानियों चाहें वह भ्रम हो, या प्रयाश्चित, अंतिम प्रश्न, टूटे संघर्ष, सामाजिक जीवन के किसी ऐसे यथार्थ की बानगी हैं जो जिसमें पात्र उद्दात जिजीविषा और प्रतिकूलताओं के बीच पीपल के बिरवे की तरह कहीं भी उग कर अपने वजूद को फैला लेने की क्षमता बढ़ाती है.
प्रतिनिधि कहानी -तस्वीर जो दिखती नहीं
संग्रह की सशक्त कहानी मानी जा सकती है. वर्किंग विमेन के लिये घर और नोकरी को साधने की चुनौती बहुत स्पष्टता और पारदर्शिता से उभरकर सामने आयी है.
जबकि घर संयुक्त जिम्मेदारियों की कर्मस्थली है प्राथमिकता और लक्ष्य भी. जो सवाल सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के साथ जन्मे थे वह विवाह के साथ नोकरी लगने तक बने रहे वंशिका ऐसे कईं पड़ावों से गुजरती है जहाँ वह वर्चस्व की जड़ता और आतंक को तोड़ती है. संवादों में
मसलन :मैडम भी गजब है न डिलीवरी के दस दिन बाद फिर से
ऑफिस ज्वाइन करना हिम्मत का काम है. (पेज नंबर 45)
यह एक ऐसा विषय है जिस पर बात कम होती है लेखिका ने इस कहानी के माध्यम से घर और करिअर साथ -साथ लेकर चलने वाली महिलाओं के सोचने के लिए पर्याप्त अवकाश दिया है जहाँ स्त्री अस्मिता की सामाजिक -पारिवारिक स्वीकृति का आंदोलनधर्मी प्रयास बन जाना इस कहानी की सार्थकता है.
इसी तरह कहानी – दो औरतें भावनात्मक बोझ को खूबसूरती से प्रस्तुत किया है.
सुनंदा और शकुंतला दोनों हो पात्र पाठकों के लिये नये नहीं है.
कुछ कहानियां प्रतिरोध में प्रतिपक्ष के निजित्व पर गहरी चोट करती है. कुल मिलाकर सरकार,कानून संविधान ,प्रचार प्रसासर स्त्री उत्थान के लिए बहुत कुछ कर रहें हैं लेकिन हमारे समाजशास्त्र में घर के भीतर स्त्री की वैचारिक जवाबदारी स्वयं पर ही निर्भर है कविता वर्मा के संग्रह से यह बात बार -बार निकलकर सामने आती है . घरों माँ ,बेटी ,बहन ,मौसी ,दादी के रूप में अपना जीवन शताब्दियों से गुजारने वाली स्त्री का मानसिक शोषण जिस नये रूप को गढ़ता है उसकी पड़ताल उसी नई दृष्टि से होनी चाहिए पर्दे के भीतर की स्त्री और बाहर की स्त्री के संघर्ष एक जैसे तो नहीं हो सकते.
ये कहानियां अनंत में खुलती पगडंडियों के ऐसे संजाल बुनती है जिसमें पाठक रुकना चाहता है. घेरे बनाती हदबंदियों को तोड़ने का उपक्रम लेखिका ने रचा है,सबसे अहम बात लेखिका ने सुविधाओं के बजाय आंतरिक संघर्ष को चुना है.
कहानी-अंतिम प्रश्न इस कहानी की प्रस्तुति में लेखिका ने जैसे जीवंत दृश्य बुन दिए गए हों. गहरा मनोविज्ञान विचारों का पैनापन सुरक्षित रखते हुए लेखिका ने इस कहानी में कितनी संभावनाओं को आकाश दिया है.
एक संवाद इस कहानी के कथानक को निष्कर्ष दे सकता है
कोई भी औरत कुछ नहीं होने का प्रमाण नहीं दे सकती और कोई भी आदमी कुछ हुआ के शक से आजाद नहीं हो सकता. पेज नंबर111 )
इन कहानियों का वितान नैसर्गिक अधिकारों के साथ समर्पण और अपेक्षा के मानदंडों के संतुलन की बात करता है.
स्त्री संघर्ष के पक्ष में संग्रह अतिरेकपूर्ण ढंग से स्त्री -सरोकारों की बात नहीं करत बल्कि संवेदना के सूक्ष्म -सघन धरातल पर पहुंच कर संबंध और मनुष्यों की चहु और लंशलिष्ट डोरियों को सुलझाने का प्रयास करता है… आत्मसंघर्ष के साथ स्त्री प्रश्न इसमें उभरते हैं
यही संग्रह को प्रासंगिक बनाता है.

डॉ. शोभा जैन, प्रसिद्ध साहित्यकार, इंदौर