क्या इतना आसान होता है
सरलता से सहज़ हो जाना,
क्या इतना आसान होता है
गिरना रोना और चुप हो जाना….
क्या इतना आसान होता है
कुछ पाना और फ़िर खो देना
क्या इतना आसान होता है
मुश्किलों में ढाल बने रहना…..
क्या इतना आसान होता है
सही होकर ग़लत सुन लेना
क्या इतना आसान होता है
एक स्त्री का मूक हो जाना…..
…….. नहीं होता सब कुछ आसान
मगर हम स्त्रियां सीख जातीं हैँ
चोट खाकर चलना, सहना और
फ़िर मुस्कुरना, यूँ हीं गुनगुनाना….
क्यूंकि जीना इसी का नाम है.

खुशी झा, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई