
पूनम सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, मेरठ
मेरी प्यारी ज़िंदगी,
कैसी हो तुम? अच्छी तो हो न?
चलो, आज तुम्हें अपने दिल की कुछ बातें सुनाती हूँ और तुमसे कुछ पूछती हूँ।
सुनो ज़िंदगी…
कभी-कभी तुम इतनी हसीन लगती हो कि तुम्हें कसकर गले लगाने को जी चाहता है।
तुम्हें जी भर जीने को जी चाहता है।
और कभी-कभी… तुम इतनी मुश्किल लगती हो कि एक-एक साँस लेना भी बहुत भारी लगता है।
सच में, मर जाने को जी चाहता है,
पर तुमसे हाथ छुड़ाना भी तो आसान नहीं है न…
कभी तुम इतनी खुशियाँ देती हो कि मेरा दामन छोटा पड़ जाता है,
और कभी इतना दर्द कि समंदर में भी न समाए…
सच में, तुम्हें समझना बहुत मुश्किल है,
पर शायद यही तुम्हारी खूबसूरती है—
कि बस अंजाने रास्तों पर तुम्हारे पीछे-पीछे चलती जाना,
बिना यह जाने कि अगला मोड़ कब और कहाँ आएगा,
बस तुम्हारा हाथ पकड़कर चलती जाना…
तुम न, बड़ी रहस्यमयी-सी लगती हो मुझे कभी-कभी।
ख़ैर…
तुम जैसी भी हो, मेरी हो हर हाल में और हर पल मेरे साथ हो।
मेरे सुख-दुख की साक्षी हो,
मेरे अकेलेपन में मेरी हमसफ़र बनकर साथ हो।
जीने के लिए मुझे तुम्हारा साथ ही काफ़ी है।
हाँ… तुम्हारे सिवा मुझे कोई और सहारा नहीं चाहिए।
अंत में बस एक ही विनती है तुमसे कि
जब कभी मैं ज़िंदगी में हारने लगूँ,
जब कभी लगे कि मैं थक गई हूँ,
तो तुम बस चुपके से आकर मुझे थाम लेना,
मुझे हिम्मत और हौसला देना…