
सुरेश परिहार, पुणे
साल था उन्नीस सौ सतहत्तर. महिदपुर रोड का छोटा-सा कस्बा उन दिनों नवरात्रि के आते ही एक अलग ही रौनक से भर उठता था. बड़ी होटल वालोंयानी पोरवाल ब्रदर्सके घर के सामने की वह खुली ज़मीन जैसे पूरे शहर की धड़कन बन जाती थी. वहीं लगता था रामलीला का भव्य मंच, और उसके साथ शुरू होती थी नौ दिनों तक चलने वाली एक ऐसी पवित्र धूम, जिसके लिए लोग पूरे साल इंतज़ार किया करते थे.रामलीला का आयोजन पंजाबी समाज की जिम्मेदारी होती थी. प्रीतमलाल जी और समाज के अन्य गणमान्य लोग अपनी सेवाएं ऐसे देते थे, मानो कोई निजी उत्सव हो. दूर-दूर से, खासकर नागौर, उदयपुर और राजस्थान के आसपास के शहरों से कलाकारों की पार्टियां आती थीं. मुझे आज भी सिर्फ एक रामलीला मंडली का नाम याद हैशायद शिव की रामलीला. इस मंडली की प्रसिद्धि दो कारणों से थी. पहला, उनके रंग-बिरंगे पर्दे, जिनके पीछे से एक-एक दृश्य जादू की तरह जीवंत हो उठता थाअयोध्या की राजश्री, लंका का स्वर्ण वैभव, वनवास की सूनी पगडंडियाँ, पंचवटी का एकांत, अशोक वाटिका की हरियाली सब कुछ जैसे आँखों के सामने सचमुच उतर आता था.दूसरा, रावण का पात्र, जिसे मंडली के मालिक शिव स्वयं निभाते थे. उनके जैसा रावण मैंने फिर सिर्फ रामानंद सागर की रामायण में स्वर्गीय अरविंद त्रिवेदी जी के रूप में ही देखा.

सीट बुकिंग का अनोखा तरीका
रामलीला की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगा लीजिए कि रात आठ बजे शुरू होने वाले कार्यक्रम की बुकिंग दोपहर तीन बजे ही शुरू हो जाती थी. बुकिंग भी कैसी? बस अपना टाट का कट्टा या छपी हुई बोरी जाकर बिछा दोबस, सीट मिल गई! स्कूल जाने वाले हम बच्चे अपना कट्टा साथ ले जाते, और छुट्टी के बाद सीधे रामलीला मैदान में जाकर अपनी जगह बुक कर देते.हालाँकि, कई बार कुछ दबंग लड़के हमारा कट्टा हटाकर अपनी बोरी बिछा देते थे. लेकिन हमें कभी दुख नहीं होता थाक्योंकि रामलीला इतनी अद्भुत होती थी कि खड़े होकर देखने में भी मज़ा आ ही जाता था.
दर्शकों का अनुशासन और व्यवस्था
मैदान में एक लंबी रस्सी दोनों हिस्सों को बाँटती थीएक तरफ महिलाएँ बैठतीं, दूसरी ओर पुरुष. बड़ी होटल वालों के घर वाली दिशा में हमेशा महिलाओं की तरफ भीड़ ज़्यादा रहती थी.
कई लोग तो सड़क किनारे ही खड़े होकर पूरी रामलीला देख डालते थे.
शुरुआत होती थी भक्ति रस से…श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन…नवरात्रि के नौ दिनों में यह स्तुति अधिकांश बच्चों को याद हो ही जाती थी.

भेंट का समय और प्रीतमलाल जी
इंटरवल में भेंट का समय होता था. लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार दान रखते.प्रीतमलाल जी पंजाबी की प्रेरणादायक आवाज़ और संचालन सबको उत्साहित कर देती. उनकी विनम्र अपील में एक अलग ही शक्ति थी.
रावण दहनएक यादगार दृश्य
अंतिम दिन रावण दहन होता था. उस समय का दहन स्थल डाक बंगले के पास था, जहाँ आज कृषि उपज मंडी है.नवरात्रि के दौरान ही पंजाबी समाज के तनेजा सर रावण का विशाल पुतला तैयार करते थे. पूरा होने पर उसे शोभायात्रा के साथ ले जाया जाताश्रीराम मंदिर से उठती वह यात्रा आज भी परंपरा की तरह जारी है.इस यात्रा में राम-लक्ष्मण और रावण का युद्ध जीवंत रूप में दिखाया जाता.रावण का पात्र निभाते थे गुड़वाले चाचाजी जिनका नाम अब याद नहीं आता, पर चेहरा साफ याद है.
हनुमान जी की झांकी तो सबसे अधिक मन मोह लेती थी| सड़क किनारे लगे केले और फलों से भरे पेड़, जिन्हें हनुमान जी छलाँग लगाकर तोड़ते और अशोक वाटिका उजाड़ने का दृश्य रचतेएकदम सजीव, एकदम रोमांचकारी! कभी-कभी वे कुछ फल दर्शकों की तरफ भी उछाल देते, और लोग उसे हनुमान जी का प्रसाद मानकर सिर झुकाकर उठा लेते.
कई बार हनुमान जी उत्साह में अपनी पूँछ को हंटर की तरह घुमाते हुए दर्शकों तक ले आतेऔर लोग इसे भी आशीर्वाद ही मानते.

कलाकारों से लगाव और अधूरी सी उदासी
नौ दिनों के इस महोत्सव के दौरान हम बच्चों का लगाव कलाकारों से इस कदर हो जाता था कि सुबह उन्हें बिना गेटअप और बिना मेकअप के भी देख लेते तो मन खुश हो जाता. वे अपने सामान्य कामकाज में दिखते, और हमें लगतादेखो, राम जी भी यहाँ चाय ले रहे हैं, लक्ष्मण जी बाजार से लौट रहे हैं| एक बार एक कलाकार बीमार हो गए और उनकी भूमिका किसी अन्य कलाकार को दे दी गई. उस दिन मन बहुत उदास हो गया. हमें लगने लगा मानो अपने ही किसी परिचित को खो दिया हो. एक अपनापन-सा जुड़ गया था उन पात्रों से.
आज इतने साल बाद जब यादें कुरेदता हूँ, तो लगता हैवो सिर्फ रामलीला नहीं थी. वो हमारे बचपन का उत्सव था. हमारी खुशियों का पर्व. और सबसे बढ़कर एक ऐसा समय, जब पूरा महिदपुर रोड एक परिवार की तरह मिलकर त्योहार मनाता था.इस साल दशहरे पर महिदपुर रोड जाना हुआ… प्रीतमलालजी पंजाबी.. इस उम्र में भी उतने ही उत्साह से रावण दहन उत्सव में व्यवस्थाएं संभालते नजर आए. मन प्रसन्न हो गया.. ईश्वर उन्हें अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करें..
सच में याद आ गया वह रामलीला का जमाना, जो शायद हमारी पीढ़ी के सभी लोगों ने देखी होगी । जो रामलीला मैंने अपने बचपन में देखी थी, जीवंत हो उठा है वह दृश्य मेरी आंखों के सामने, आपका आर्टिकल पढ़ कर ।
उस जमाने में लाउडस्पीकर में ही लगाता था,
बड़े जयदयाल जी पंजाबी इस संबंध में मुझ से ही कान्टैक्ट करते थे,
बहुत ही बढ़िया लिखा है
बीता हुआ समय सब कुछ याद करवाया
बहुत बहुत धन्यवाद, सर