छप्पन वर्ष

आज सुबह से ही फोन और मोबाइल की ट्रिन – ट्रिन से वह परेशान हो रहे थे और गिनते जा रहे थे कि कितनी काल आई है और कितनी – कितनी देर तक बात हो रही है | परेशानी का कारण ट्रिन – ट्रिन की आवाज़ या छोटी लंबी बात नहीं थी बल्कि उनका न सुनाई देना था | समझ नहीं पा रहे थे आज हुआ क्या है जो सूरज उगने के पहले से ही कॉल आ रही है | ऊब कर उठ बैठे और आवाज़ दे दी ‘” चाय मिलेगी ? आज क्या बात है सुबह से ही बड़े फोन आ रहे हैं …

“हाँ…बच्चे शादी की सालगिरह की बधाई दे रहे हैं |”

“किसकी शादी की?”

“हमारी, और किसकी… गैस पर चाय का सस्पैन रखती वृद्धा हंसी | समझ आने से अब वृद्ध भी हँसे थे |”

“कितने बरस हो गए हमारी शादी के?”

“पचपन बरस …उंगली पर सन को जोड़ते … नहीं छप्प्न बरस हो गए ॥“

“बड़ा लंबा समय जी गए भई “ वृद्ध के चेहरे पर आश्चर्य फैल गया |”

“हाँ , ऐसे ही समय बीत जाता है …”

“चाय बनी ?”

“हाँ बन ही गई है | आ रही लेकर …”

“ कितने छोटे – छोटे थे बच्चे जब हम इलाहाबाद में थे | कभी हांथी पार्क जाने की जिद तो कभी कल्याणी देवी वाले पार्क और दशहरा की भोर वाली चौकी….” हंस दिये आगे के आधे टूटे दांत से | “ कितनी भीड़ होती थी लोकनाथ से लेकर कोतवाली तक | सोम और तुला तब बहुत छोटे – छोटे थे | कंधे पर बैठा कर चौकी दिखानी पड़ती थी | कंधे दुख जाते थे पर अजीब सुख मिलता था |
“ हाँ , उस समय तो दोनों ही छोटे थे | चाय को ट्रे में रख वह बेड के पास आ गई |
“ आज कितने बड़े हो गए हैं ? “ वृद्ध की आँखें ढँक गईं | बच्चों के दौड़ते , खेलते , लिपटते कई सारे चित्र आँख के पर्दे पर बनने सिमटने लगे | नन्हें पंजों की छाया , आँख मिचोली खेलते , चोर न बनने की ठिन – ठिन , ठंढ में रज़ाई का घर बनाकर मूँगफली के दानों का खाना पका कर खिलाना …सब किसी कलाकार की कृति सा बनता बिगड़ता रहा …” कितने अच्छे दिन थे पर आज समय कितना बदल गया है ? ये बच्चे कंधे भूल गए | कहते हैं क्या किया है आपने ? ये अपने जीवन की खुशियों का हिसाब मांगते हैं | एक दूसरे की होड़ में जलील करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते ?”
“ शायद सही ही कहते हैं |”
“ छोटी सी नौकरी कहाँ पर्याप्त थी इनकी खुशियों के लिए | पर मैंने भी तो इनसे कभी कुछ नहीं मांगा | न अपने लिए न तुम्हारे लिए ? कभी नहीं कहा मुझे कुछ दे दो…पर इन्होने तो …
“ क्या हुआ ,? क्या सोचने लगे , चाय नहीं पीनी ?”
आँखें खोल दी वृद्ध ने | “पता नहीं क्यूँ आँख लगने लगी थी |”

दोनों ने चाय पीते – पीते बहुत सी बातें की | बातें , लंबे साथ चलते जीवन के संघर्ष की | बातें , उससे निकलने के साहस की | बच्चों के बचपन के मिठास की तो आज की चीरती उनकी भाषा की | रिश्तों के सुंदरता की ,तो उसके चोटिल विद्रूपता की और घर की देहरी लांघ अंत में महीनों से चल रहे उस युद्ध की जिसे रशिया ने यूक्रेन के ऊपर थोप रखा है | जो कभी भी विश्व युद्ध की दस्तक बन सकता है | हाँ , इन सब बातों का मूल जो उन्हे समझ आया था वह था पैसा ; जिसका होना जीवन को अर्थ देता है और न होना नीलामी |
चाय खतम हो गई थी | बातें भी रुक गईं | वृद्ध ने ट्रे उठा कर उठती पत्नी का एक हाथ हथेली में भर कर समेट लिया | हंस दिए दोनों सफर के अंतिम पड़ाव पर पहुंचे उस यात्री की तरह जिसके साथ उसका सहयात्री निर्भीक खड़ा हो | जहां प्रतिदिन के जीवन मे मित्रों का जमघट हो | किताबों का साथ हो | क्यारियों में उगाते फूल और सब्जियों से रागात्मक लगाव हो और रसोईं में धीरे – धीरे बनती – पकती प्रतिदिन की संतुष्टि हो | खुश थे दोनों आज अपने छप्पन वर्षों को जीकर जिसे सुबह से ही बच्चों के हँसते , शुभकामना देते शब्दों ने याद दिलाया था |
“ क्या बना रही हो आज? ” आँगन की आलमारी से खुरपी निकालते वृद्ध ने पूछा | “सोच रही सरसो डली तरोई और चने की दाल बना लूँ … आप क्या कह रहे? “

“ बना लो | और कुछ मीठा भी बना लेना “ कहते वह पीछे बगीचे में निकल गए और व्यस्त हो गए दोनों अपने – अपने जीवन के खटराग में | अभी वह तरोई लेकर बैठी ही थी कि घंटी बजी देखा आदित्य खड़ा था | चेहरा खिल गया | अरे आदित ! आ…ज…अभी !
“ ये गुलदस्ता लेकर कहाँ जा रहे बेटा …. आदित्य के एक हाथ में खिले – खिले फूलों का गुलदस्ता और दूसरे में भूरे रंग का पैकेट देख पूछती वृद्धा आदित्य को लेकर भीतर आ गईं | “ बड़े पिताजी कहाँ हैं ?”

“ कहाँ हो सकते हैं वह , दुलार रहे हैं अपनी बगिया को ? अपने लगाए पेड़ पौधों को | “

“ तुम बैठो , मैं बुला कर लाती हूँ | “ कहती रसोईं के पास ही उन्होंने आदित्य के लिए कुर्सी खींच दी | “

“ आप अपना काम करिए बड़ी अम्मा , मैं बुला कर लाता हूँ |” वृद्ध को बुलाकर आदित्य ने ड्राइंग रूम में दोनों को एक साथ बैठा कर गुलदस्ता , भूरे रंग के पैकेट के साथ मिठाई का डिब्बा देकर दोनों का पैर छू लिया |

“ ये सब क्या है… कुछ समझते कुछ न समझते दोनों परेशान थे क्यूंकि उनके जीवन में यह पहली बार हो रहा था | “ आप दोनों को छप्पन वर्ष साथ जीते जीवन के लिए एक छोटी सी भेंट ….आदित्य ने थोड़ा झिझकते हुए कहा | “ आज आपकी शादी की वर्ष ….कहते आदित्य ने मोबाइल की काल में रहे नंबर को धीरे से मिला दिया | दोनों वृद्धों की आँखें बारिश की बूंदों सी झिलमिला उठीं | खुशी के रेशे चेहरे की लकीरों में उलझ गए |

“ आज सुबह से ही अमन , विनायक , श्यामली के साथ ही उनके बच्चों का भी फोन आया था| अच्छा लगता है आज के जमाने का ये रिवाज, पर न जाने क्यूँ थोड़ा संकोच भी लगता है ….हमारे समय में तो ये सब था नहीं या शायद रहा भी होगा तो ऊंचे लोगों में….

“ न जाने क्यूँ आज तुम्हारी बड़ी दी का ही फोन नहीं …वृद्धा थोड़ी अनमनी सी हुई थी |

“ आपका फोन ….. बड़ी …अम्मा

“ कौन है… हैलो – हैलो – कौन

“ माँ–

“ अर्चना ! ….. अभी आदित को मैं यही कह रही थी कि सबका फोन आया बस तुम्हारा ही नहीं – कैसी हो बेटा ?”

“ ठीक हूँ माँ , बहुsssत अच्छी हूँ पर पहले ये बताओ कैसा लगा सब ?”

“ क्या……

“ वही , जो तुम्हारे हाथ में है –

“तुम……

“ हाँ माँ , आज तुम दोनों का दिन है और यह छोटी सी खुशी तुम्हारे इस दिन के लिए |”

“ अर्चना ……

“ न माँ , आज नहीं …एक बूंद भी नहीं | आज तो पापा के साथ तुम्हारे छप्पन वर्ष साथ बिताए जीवन के गर्व का दिन है | हम सबकी , समय – बेसमय ,तुम दोनों पर उतरी कटुता , कड़ुवाहट को बरसों बरस जीकर , हमे रास्ता दिखा कर जो हमे लाइफ दी है न माँ , उसके भी सेलिबरेशन का दिन है | बहुत किया है तुमने माँ…. बहुत ….

“हमने तो जाने अनजाने तुम्हें दुखाया ही है —

“ सच पुछो तो आज तो तुम्हें बहुत कुछ मिलना चाहिए था माँ …कह कर अर्चना चुप हो गई | कुछ घुटने लगा था भीतर |

“ नहीं बता सकती माँ कि जब भी किसी को अपने माता – पिता के शादी की पचासवीं सालगिरह को सुंदर ढंग से मनाते देखती हूँ तो आज से पाँच – छै साल पहले तक अपने पास कुछ न होने का बहुत दुख होता है | शायद इसीलिए तब इन सब बातों की समझ भी नहीं थी | पर माँ बहुत फील होता है …. बहुत फील होता है | हम से साधारण मध्यम लोग , समय के साथ चलने की चाह और उससे मिली कुंठा और परेशानी में अपना कितना कुछ खो देते हैं : और जो सबको संभालने की कोशिश करते हैं वह अधिकांश अपमानित होकर टूट जाते हैं | “ पर इन सारी बातों को वह पी गई और हँसती हुई बोली “ छोड़ो ये सब | अब तुम और पापा खुश रहा करो |”

“ कभी पीछे पलट कर न अब देखना न सोचना | बस खुश रहना | “

“ बहुत सताया है हम सब ने तुम्हें | लड़ाइयाँ की हैं ….झगड़े किए हैं | याद है वो हिल की सैंडल खरीदने के लिए हुई लड़ाई ….और वो टूअर के लिए नेपाल जाने के लिए हुई लड़ाई ….? सुन रही हो न ? सैंडल तो मैने खरीद कर ही दम लिया था पर नेपाल…. तेज से हंसी वह “ मैं नहीं गई तो बस ही लौट आई वह भी माओवादियों के कारण | “

“ याद आ रहा कुछ… वो जो वहाँ की एकोनोमिकल प्रोब्लम के कारण किसानों और टीचर्स ने प्रदर्शन किया था …सड़कें जाम की थीं ….याद है कुछ ?”

हंस दी वृद्धा | “ बस ऐसे ही हंसा करो माँ ….ये मेरी आज्ञा है …. खिलखिला कर हंस पड़ी वह | वृद्धा भी हंसी |

“ नहीं लगता माँ , ये जीवन बहुत छोटा है … बहुत अनिश्चित …

“ अरेsssss अभी माँ बेटी की बातें खतम नहीं हुईं ?” अपने मिट्टी से सने हाथ को बेसिन में धुलते वृद्ध फिर से लौटे थे |

“ नयी क्यारी तैयार हो गई …

‘हाँ जी तैयार हो गई | अब लाओ मोबाइल मुझे दो …

“ कितनी बातें माँ से हो रही बिटिया …. अभी मुझे पता चला है कि यह सब कारगुज़ारी तुम्हारी है ? “ स्पीकर चलने के बाद भी कान से मोबाइल सटाए वृद्ध ठहाका लगाते हैं |

“ ऐसे ही हमेशा हँसा करिए पापा | खुश रहा करिए तभी माँ भी खुश रह पाएगी … पर अर्चना ने कहा कुछ नहीं बस हँसती रही वृद्ध के साथ | ,

“ अच्छा लग रहा बेटा … बहुत अच्छा लग रहा … थैंक्स … मेनी – मेनी थैंक्स टु यू ऐंड योर हजबैंड | आज की खुशी के लिए मेरे पास शब्द नहीं है ….

“ पापा …

“ कुछ क्षण अनमोल होते हैं … कहकर वृद्ध ने मोबाइल वृद्धा को पकड़ा दिया और अपनी भरी आँख और मन को मेज पर रखे गुलदस्ते में उलझा दिया | जीवन भर एक पुरुष दर्प पाले जीते और आज भी समय बे समय वृद्धा पर उसकी छाया उड़ेलते इस समय ओस की बूंद से झिलमिला रहे थे | उनको धीरे से सहलाते वृद्धा ने मोबाइल कान पर लगाते पूछा “ रखें ?”

“ रखो | पर सुनो माँ … वो मिठाई और बुके मेरी ओर से है पर जो पैकेट तुम्हारे पास गया है वह आदित्य की ओर से है | उसमें पापा के लिए पैजामा – कुर्ता है | यह आदित्य की इच्छा थी मैंने कुछ नहीं कहा था |”

“ माँ … माँ

बहुत कठिनाई से आवाज़ आई थी …हूँ

“ क्या बना रही हो आज ? “

“ तुम क्या खाओगी ? …. भारी शब्दों से हंसी थी वृद्धा

“ तुम्हारे हाथों की मीठी – मीठी खीर | मखाने वाली …

“ ठीक … है … शब्द गले के पानी में फंसे धीरे – धीरे बाहर आ रहे थे | मोबाइल कानों से सटा था पर अब दोनों चुप खड़ी थीं |

रेणुका अस्थाना, कहानीकार, भिवाड़ी (राजस्थान)

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