गहना

कल्पना मनोरमा, प्रसिद्ध साहित्यकार, नई दिल्ली

पहनना है गहना—
तो बेशक पहनो,
पर खो मत देना
पाजेब की रुनझुन में
वह नगीना,
जिसकी पहचान बड़ी मुश्किल से
करवाई है तुम्हें वक्त ने
कुदालों की बाट देखना बंद करो,
उठाओ अपनी सुइयाँ—
जिन्हें पकड़ाया गया था
जन्म लेते ही तुम्हारे हाथों में
प्यास बढ़े तो ताकना मत इधर-उधर,
पैनी करो अपनी तुरपाई वाली सुइयाँ
निर्मल जल का सोता
फूटने को मचलता मिलेगा
खोद लो कुआँ उन्हीं सुइयों से
और बुझा लो अपनी प्यास
इतना करने के बाद भी
जीत का जश्न मनाना मना है!
जीत की साँसों में पहचानो हार को,
जो देती आई है पटखनी
तुम्हारे सबसे भावुक पलों में
मैं तो कहती हूँ—
ओढ़ लो अपना आत्मविश्वास
और बना डालो
अपने सबसे थके दिन को अमर
क्योंकि जिंदगी का अभियान
सालों में नहीं,
प्रत्येक दिन में छिपा है
सोचकर यही—
माँग लो जीवन की धूप और बना लो माँगटीका
सबसे ज़रूरी है तुम्हारे लिए
अपने लिए सुहागिन बने रहना।

2 thoughts on “गहना

  1. विचारणीय, प्रेरक कविता ।बहुत बढ़िया कल्पना मनोरमा जी🌷

  2. सभी पाठकों का आभार-अभिनंदन, आप
    इसी तरह उत्साहवर्धन करते रहें
    -सुरेश परिहार, एडिटर, लाइव वॉयर न्यूज

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