
मंजुला श्रीवास्तवा, प्रसिद्ध साहित्यकार
माँ की गोद के आँचल में पलते-बढ़ते
हमने सीखी उस लोरी में अपनी हिंदी।
तब ही जाना, रिश्तों की जान है हिंदी,
संबंधों का मान, मनौव्वल लाड़ है हिंदी।
खारे-कड़वे-मीठे वर्णों में संस्कार है हिंदी।
बच्चों-बूढ़ों की तोतली जुबान है हिंदी,
व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान है हिंदी।
वीरों के बलिदानों में माया-त्याग है हिंदी,
ऋषि, मुनि, वेदों-उपनिषदों की सभ्यता है हिंदी,
विश्व-फलक पर लहराते परचम की प्यार है हिंदी।
हृदय में उठते-गिरते भावों की बात है हिंदी,
कैलाश विराजे आदि-अनादि की ओम है हिंदी।
भागीरथ साधना से तारे गए पुरखे हैं हिंदी,
विनती करते राम के तीर-कमान हैं हिंदी,
तिनके के साए में सीते की लाज है हिंदी,
द्वार पधारे भीलनी के बेरों की राम है हिंदी।
गर रास रचाते कृष्ण की गोपियाँ हैं हिंदी,
तो ज़हर के प्याले में कृष्ण की मीरा है हिंदी।
काशी तट पर चरण गहे संत कबीरा है हिंदी,
चर्म-सीते-काठ-कठौती-राम-रहीमा है हिंदी,
तकली-सूत ने गोरों को देश निकाला है हिंदी।
धन्यवाद आदरणीय
लेकिन हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि उचित अवसर पर संदर्भित रचना प्रकाशित हो तो बेहतर होता है।
हिन्दी भाषा की व्याख्या करती सुन्दर कविता।
धन्यवाद जिज्ञासा जी आप तक कविता पहुँची और आपकी अमूल्य टिप्पणी प्राप्त हुई।