कटहल! कटहल! कटहल!

तो समझ में ये आया कि कुछ लोग कटहल नॉनवेज की जगह खाते हैं. पर हम यह कटहल न इसके जैसे, न उसके जैसे केवल कटहल जैसे ही खाते हैं. और बडे चाव से खाते हैं.
एक समय था जब नानाजी के घर कटहल (मराठी में फणस) आता था और हम सब मिलकर उसे एक फल की तरह खाते थे. उसके गिर (अंदर की बीज और उसके चारों तरफ का पल्प) बडे स्वादिष्ट और मीठे होते हैं. पीले रंग के. मुझे बहुत पसंद हैं. यहाँ पुणे में भी पका हुआ कटहल खूब बिकता है. मेरी नानी जब अपने मायके (मम्मी के मामा के घर) गोवा जाती थीं तब वहाँ से खेतों के ताजे भुने हुए काजू, आम पोळी (पापड) और कटहल के बेहद स्वादिष्ट पापड ग्वालियर लेकर आती थीं. वहाँ एक अलग प्रकार की मिर्च होती है जो मिर्च तो होती है लेकिन छोटी-छोटी गोल और काली होती है. ये वो वाली कालीमिर्च मत समझना. बहुत तीखी होती है. उस मिर्च को और नमक डालकर कटहल के पापड, आलू के पापड जैसे ही बनते हैं. बस उतने बडे नहीं होते. छोटे-छोटे आयताकार कटे होते हैं. और उसे तलकर खाओ तो आहाहा इतने स्वादिष्ट की क्या ही कहने! और वो काजू भी मम्मी के मामा भिजवाते थे. भले ही सबके हिस्से थोड़े-थोडे आएं मगर उसका तो स्वाद ही निराला होता. ये जो पॉलिश्ड काजू मिलते हैं न वो सब उसके आगे फीके हैं.
कटहल हमारे मायके में भी बनता है. बारीक-बारीक काटकर. राई-हींग से छौंककर आधा गलने के बाद उसमें ढेर सारा गीला या सूखा नारियल डालकर बनता. कभी-कभार उसे तलकर रस्सा भाजी (मराठी रस्सा) बनती. मगर कम तीखी. हम लोग ज्यादा मिर्च नहीं खाते. और प्याज-लहसुन भी घर पर नहीं आता था. इसके बाद भी स्वाद तो स्वाद था. यही स्वाद हमारे बच्चों तक पहुंचा. उन्हें भी कटहल की सब्जी बडी पसंद है.
एक मजेदार बात हमारी मम्मी हमें बतातीं कि गोवा तरफ जब कटहल की सब्जी बनती है तो केवल अंदर के बीजों की बनती है. बचे हुए कटहल का पूरा हिस्सा घर के पालतू जानवरों को खिलाया जाता था. तब हम लोग ये कहकर हंसते कि हम लोग कौन हैं जो पूरा कटहल खाते हैं? और फिर जोर से ठहाका लगाकर सब लोग हंसने लगते. कल भी मैं सब्जीवाले से कहकर आयी हूं कि कटहल आए तो भिजवा देना. हम बस वो कटहल के पापड बहुत मिस करते हैं. कहीं बाजार में नहीं मिलते. मम्मी की मामी सबकुछ घर पर बनाती थीं. अब तो बस उस स्वाद के साथ यादें शेष हैं.

समीक्षा तेलंग
पूर्व पत्रकार, सुप्रसिद्ध लेखिका, पुणे

One thought on “कटहल! कटहल! कटहल!

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