आहिस्ता चल
ऐ ज़िन्दगी !
डगर मुश्किल
सफ़र है तन्हा
कुछ अजनबी रास्ते
और कुछ यादें, है अब
मेरे अकेलेपन के साथी
छोड़ गए थे तुम, जो
अपने हिस्से की धूप
अब भी रखती है महफ़ूज़
मेरे एहसास सर्द हवाओं से
सिमट जाती हूँ खुद में
देखकर तन्हा रास्ते…पर
एक उम्मीद लिए चले जा रही हूँ
तुम तक जो पहुंचे
कोई राह तो वो होगी….!!

मधु झुनझुनवाला ‘अमृता’ जयपुर
अकेलेपन का सफ़र , साथी की यादों और मिलने की उम्मीदों पर आधारित होता है ।
” साथी की हिस्से की छोड़ी हुई धूप ” इस बिछड़ने के एहसास को अपनी नरमाहट से पोषित करती है , सही पथप्रदर्शक अभिव्यक्ति है ।
सुंदर लेखन
खूबसूरत अंदाज़