उम्मीदों की खिड़की से

अनीता अरोड़ा, प्रसिद्ध लेखिका,लखनऊ

उम्मीदों की खिड़की सदा खुली रखना,
हों चाहे कितनी भी मुश्किलें,
बस आशाएँ जगाए रखना।

दुनिया कहे कुछ भी मगर,
तुम अपना हौसला बनाए रखना।

आएँ क्यों न कितनी भी आंधियाँ,
मगर दिया दिल का सदा जलाए रखना।

बनना मगर तुम पत्थर नहीं,
बस टूट कर, तराश कर,
खुद को अच्छा इंसान बनाए रखना।

इम्तिहान तो आएँगे ज़िंदगी में बहुत,
मगर लक्ष्य अपना तुम बनाए रखना

2 thoughts on “उम्मीदों की खिड़की से

  1. किसी लड़की का अपने जीवन का रास्ता खुद बनाना आसान नहीं । बहुत से लोग सही- गलत
    सलाहों से रुकावट डालते हैं ।
    बहुत सटीक लिखा है

    ” बनना मगर तुम पत्थर नहीं,
    बस टूट कर, तराश कर,
    खुद को अच्छा इंसान बनाए रखना।
    इम्तिहान तो आएँगे ज़िंदगी में बहुत,
    मगर लक्ष्य अपना तुम बनाए रखना । ”

    आप बहुत प्रशंसा की पात्र हैं ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *