इसी तरह सोचो

डॉ. आशासिंह सिकरवार, प्रसिद्ध साहित्यकार, अहमदाबाद

धूप में तपने दो देह
घुप अंधेरे में सिकुड़ गई है  ।

मेमना- सी कांपती
आवाज़ ने क़िले की दीवारों को फांदकर


नई राह पकड़ी है  ।

लोहा आग में पिघलता है
तब लेता है आकार
किसी भी साँचे में ढल जाए
वह अपनी ताकत नहीं खोता  ।

बिटिया
इसी तरह सोचो
तभी जिंदा रह पाओगी
इस जंगल में  ।

5 thoughts on “इसी तरह सोचो

  1. आशा जी , बहुत सामयिक लिखा आपने ।
    रोज़ कई हादसे हमारे आसपास होते हैं तो बेटियों को समझाएं कैसे.

    लोहा आग में पिघलता है
    तब लेता है आकार
    किसी भी साँचे में ढल जाए
    वह अपनी ताकत नहीं खोता ।

    ” बिटिया
    इसी तरह सोचो
    तभी जिंदा रह पाओगी
    इस जंगल में । ”
    बहुत उत्साहित करने की प्रेरणा देता है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *