
डॉ. नेत्रा रावणकर, उज्जैन
पड़ोस के आयुर्वेद क्लिनिक में रोज़ एक बूढ़ी अम्मा और उनके साथ एक युवा महिला को देखती थी। बड़े ही प्रेम से वह उनको ऑटो से उतारती, पसीना पोंछती, पीने का पानी देती। मालिश होने के बाद पुनः अपने कंधे पर उनका भार ढोकर घर ले जाती। हमारी एक-दूसरे से नज़र मिलती तो स्माइल ज़रूर होती थी।
एक दिन मैंने पूछ ही लिया —
“कितनी तकलीफ़ है न अम्माजी को। आपकी माँ हैं?”
उसने जवाब दिया —
“सासु माँ।
मैं जॉब करती हूँ, मेरे बच्चों को इन्होंने फूल जैसा पाला है, बहुत मेहनत की। अब मेरी बारी है…”