…अगर ज़िंदगी फिर से मुड़ जाए

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उम्र के इस पड़ाव पर ,
अक्सर सोचती हूँ मैं ……….
ज़िंदगी तू अगर एक बार फिर ,
थोड़ा सा मुड जाये …… तो
मैं अब की और बहुत कुछ या
वो सब कुछ कर लूँ ,
जो नहीं कर पायी थी तब ।
या
जो नहीं किया है , मैंने एक अर्से से ;
चल कर एक बार फिर ,
अपनी उस अलमारी को जँचा आऊ ,
जिसके ऊपर वाले खाने में भरे है ;
मेरे कुछ फ़ेन्सी ड्रेस वाले लाल गुलाबी कपड़े ,
कुछ काढ़े हुए और कुछ शीशे लगे दुपट्टे ।
सहेज आऊँ, वो खेल- खिलौने
गुड़िया और मिट्टी के बर्तन …………
मैं, एक बार फिर बतियाना चाहती हूँ,
पड़ोस वाली उस जिज्जी दादी से ।
मिलना चाहती हूँ, हर उस शख़्स से,
जिससे मिलने के हम आदी थे ।
पुराने अख़बार के नीचे दबी-छिपी पड़ी है ,
वर्षों से मेरी वो कविता लिखी डायरी ,
जिसके पन्ने पलटते ही ,
गिर जायेंगी सूखे सुर्ख़ गुलाब कि कुछ पंखुड़ियाँ ….
सोचती हूँ ,
अब की बार बहुत अच्छे से तैयारी करूँ ,
अपने इम्तहानों की ……….
फिर चाहे वो;
ज़िंदगी के हो या स्कूलों के ।
इस बार , सुनूँगी माँ की हर बात ध्यान से ,
और मानूँगी भी उनकी हर सलाह को ।
कुछ रिश्तों को मैं ,
फिर से सहेजूँगी और संभालूँगी ,
प्यार और समझ-बूझ के साथ निभा लूँगी।
और ……………..
बचपन से पचपन तक के सारे अनुभव ,
अपने जीवन को बेहतर बनाने में लगा दूँगी !!

बबिता नागर छाबड़ी
प्रसिद्ध साहित्यकार एवं ब्लागर, गुरुग्राम

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