
प्रमिला पांडे, वरिष्ठ साहित्यकार, कानपुर
कमज़ोर नहीं होती ये मेरी चूड़ियाँ
दिखने में तो लाल, हरी, काली चूड़ियाँ
कमज़ोर नहीं होती ये मेरी चूड़ियाँ।।
वेशक ये काँच की हैं, मज़बूत बहुत हैं
रंगों में अनेक, मगर एक स्वरूप हैं।
मुद्दत से बोझ अपना उठाती ये चूड़ियाँ।। कमज़ोर नहीं।।
उठे जो हाथ माँ के दुआ के लिए कभी
ले लेती बलाएँ, दुआएँ देती हैं सभी।
छू लो गगन को आज ये कहती हैं चूड़ियाँ।। कमज़ोर नहीं।।
बाँधे बहन जो राखी, खनकती हैं चूड़ियाँ
रिश्तों की याद हमको दिलाती हैं चूड़ियाँ।
हो उनकी उमर लम्बी, कुछ बात यूँ चले
हाथों की कलाई से सिमटती हैं चूड़ियाँ।। कमज़ोर नहीं।।
गर प्यार या मनुहार से प्रियतम कभी मिले
फिर मन के बाग़वाँ में खुशियों के गुल खिले।
जीवन की डोर बाँध के रखती ये चूड़ियाँ।। कमज़ोर नहीं।।
ओ मेरी प्यारी बहनों, एक बात ये सुनो
कुछ भ्रष्ट नेताओं के, दे अपमान न करो।
अपने वसूल से नहीं डिगती ये चूड़ियाँ।। कमज़ोर नहीं।।
बहुत सुंदर
Very good
Very good
जय हो
बहुत अच्छी लगी,सच में कमजोर नहीं है यह चूड़ियां और उनको पहनने वाले हाथ
बहुत ही सुन्दर रचना लिखी है आपने 🙏