शहर के एक जाने-माने अस्पताल के सात सितारा आईसीयू के बाहर, कुर्सियों पर बैठे हैं कुछ घरवाले। रिश्तेदार चाय की चुस्कियाँ ले रहे हैं और गपशप का माहौल बराबर जारी है। अमन कभी आईसीयू के भीतर जाता है, कभी बाहर। जैसे ही बाहर आता है, कोई न कोई रिश्तेदार उसे पकड़कर कान में कुछ फुसफुसा कर अपनी उपस्थिति और चिंता दोनों जाहिर कर ही देता है—
“अच्छा… क्या कहा डॉक्टर ने?”
“नाडी कैसी चल रही है ..? “
“बात तो कर रहे हैं न ? “
अरे इतनी दूर से आये हैं सब रिश्तेदार,एक बार तो हम सबको मिलवाना चाहिए न “
अमन हाथ जोड़ कर माफी मांगते हुए -मामाजी ,क्या करें आई सी यू का प्रोटोकोल ऐसा है l लेकिन डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए है ,कहते हैं अब कोई भी आशा नहीं है ..l”
“अरे, ऐसे कैसे! मैं तो कहता हूँ इन्हें किसी दूसरे अस्पताल में रिफ़र करवा लो। यहाँ कोई व्यवस्था ही नहीं है। हमें मिलने तक नहीं देते ये लोग !”
इसी बीच अमन की बुआ नारियल, सिंदूर और एक लाल कपड़े में लपेटकर कुछ लेकर आईं। बोलीं—
“इसे जाकर रख आओ वहाँ। बाबा मानसुखगिरि का प्रसाद है। देखना, आज शाम तक उठ खड़ा होगा भाई!”
पिछले दस दिन से अमन भारत आया हुआ है। एनआरआई है वो , ग्रीन कार्ड होल्डर। सात साल से अमन अमेरिका के एक शहर में सेटल है। किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में बेहतरीन नौकरी।उसकी पत्नी भी वहीं दूसरी एमएनसी में नौकरी करती है। छुट्टियाँ तो नहीं थीं, लेकिन आना पड़ा… आखिर पापा अब तो आईसीयू में भर्ती हो गए हैं। कितनी चिंता है उसे माता-पिता की। लेकिन माता पिता वही ठेठ भारतीय ज़िद्दी मिज़ाज, साथ जाने को तैयार ही नहीं थे। कहते थे—“इस देश की मिट्टी में जिए हैं तो मरेंगे भी यहीं ।” पापा दो साल से बीमार थे। अमन रोज़ वीडियो कॉल पर बात कर लेता, पोते से भी मिलवा देता। ऑनलाइन कंसल्टेशन भी करवा दिया था डॉक्टर से। यहाँ भी उसका एक दोस्त डॉक्टर है, उसी ने सब संभाल लिया। तबीयत बिगड़ने पर प्राथमिकता से आईसीयू में भर्ती करवा दिया। लेकिन जब पापा ने कहा—“बेटा, आखिरी साँसें गिन रहा हूँ… एक बार पोते का मुँह देख लेता… आ जाते तो…”—तो आना ही पड़ा।
अब पापा वेंटिलेटर पर कृत्रिम साँसें ले रहे हैं। डॉक्टर ने जवाब दे दिया है। कहा—
“वेंटिलेटर हटवाने की ज़िम्मेदारी अब अमन की है। उसे लिखकर देना पड़ेगा।”
अमन चाहता है कि आज ही वेंटिलेटर हट जाए, क्योंकि उधर बॉस ने आखिरी वॉर्निंग दे दी है। पहले ही दस दिन हो चुके हैं। दस दिन और नहीं आया तो नौकरी से बर्ख़ास्त। अमन की मिसेज़ भी आई हैं, लेकिन वो तो ससुर के साथ-साथ खुद भी अस्पताल के बिलों से कोमा की स्थिति में पहुँच चुकी हैं।
अमन चाहता है वेंटिलेटर हट जाए, मगर रिश्तेदार हैं कि उन्हें लगता है—अभी अमन पूरी तरह बर्बाद नहीं हुआ है, इसलिए कुछ दिन और खींच लो। ऐसे समय में रिश्तेदारों का प्यार पाताल से आसमान छू लेता है। रिश्तेदारों के तानों से बचने के लिए अमन दो दिन और खींच लेता है।
लेकिन इस बीच अमन को ख्याल आता है—इस एन वक्त की आपाधापी से कैसे बचा जाए? वह अपने सबसे कॉन्फ़िडेंशियल दोस्त से बात करता है—
“यार, मैं तो इस शहर में कुछ जानता ही नहीं…”
दोस्त—
“चिंता न कर! इवेंट वालों को बुला लेते हैं , सब एडवांस में करवा लेंगे बुक ।”
(मोबाइल देखते हुए) “बिल्कुल! मैंने गूगल किया है—‘संस्कार प्लानर प्राइवेट लिमिटेड’। इनके पास तेरह दिन पूरा मेन्यू पैकेज है। सबसे पहले दाह-स्थल की बुकिंग करवा लो मित्र, वरना नंबर आते-आते पता लगेगा कि एक आप और इवेंट का बंदा ही रह गए हैं—वो इसलिए कि उसे बाकी के पैसे लेने हैं। शोकसभा में सारी व्यवस्थाएँ यही संभाल लेंगे। तेरह दिन का तेरह प्रकार का भोजन मेन्यू, भव्य पंडाल, भीड़ जुटाने के लिए रिज़र्व फोर्स… सब इनके पास है।”
इतने में इवेंट मैनेजर एंट्री मारते हैं, हाथ में फोल्डर लिए हुए—
“नमस्कार! आप लोग भाग्यशाली हैं कि हमें चुना। देखिए, पंडाल से लेकर पंडित, हार से लेकर हारमोनियम तक—सब हम एडवांस में कर देंगे। शोकसभा में भीड़ चाहिए? हमारी इमोशनल सपोर्ट टीम उपलब्ध है। और हाँ, वीआईपी पैकेज में फ़ोटो एलबम और लाइव स्ट्रीमिंग भी दे देंगे।”
आईसीयू के दरवाज़े से आती बीप-बीप की आवाज़ रिश्तों की बची-खुची संवेदनाओं पर अंतिम प्रहार कर रही थी। अस्पताल की मशीनें बस शरीर को खींच रही थीं, और घरवाले—इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के स्मार्ट पैकेज में रिश्तों का अंतिम संस्कार कर रहे थे।

डॉ. मुकेश असीमित, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, गंगापुरसिटी (राजस्थान)
Thanks for the post
आपने तो अपनी लेखनी से सत्य के और वास्तविक वस्तुस्थिति के चित्रण से सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों पर कटाक्ष कर हिला दिया ही है।🙏🙏