
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज पुणे
महिदपुर रोड को आज देखता हूँ तो लगता है जैसे वह कोई और जगह हो. किराने और मोबाइल की दुकानों से भरी यह सड़क उस दौर में होटलों की सड़क हुआ करती थी. हर होटल स़िर्फ खाने की जगह नहीं थी, वह लोगों की आदतों, उम्मीदों और किस्मत के उतार-चढ़ाव की गवाह थी.शिवनारायणजी की होटल, बड़ी होटल, महेश मोदी, सेडूराम, शंकर सेठ, खारवा वाले मदन दा, रमेश दा पोरवाल, पारस दा भंडारी, नाथू बा उपाध्याय, मदन माली, कन्हैया सेठ, सीरु सेठ इन नामों को लिखते हुए लगता है जैसे एक-एक कर चेहरे सामने खड़े हो गए हों. तब बाला सेठ की होटल नहीं थी; वे सेव का ठेला लगाते थे और वही ठेला भीड़ जुटाने के लिए काफी था. रेलवे स्टेशन के आसपास की होटलें दिन में सामान्य रहती थीं, लेकिन जैसे-जैसे रात के नौ बजते, माहौल बदलने लगता था.
दादाभाई की दुकान पर सट्टे के नंबर खुलने का समय होता था.वहीं से तय होता था कि किसकी रात मीठी होगी और किसकी चुप…जो लोग खुलेआम सट्टा लगाते थे, वे भीड़ में खड़े रहते थे. और जो सामाजिक लिहाज़ से खुद को अलग रखना चाहते थे, वे किसी और के ज़रिए नंबर लगाते थे. नंबर खुलते ही नज़रें मिलती थीं, पलकें झपकती थीं और आँखों ही आँखों में समझ लिया जाता था कि नतीजा क्या रहा. उस पल का माहौल मुझे हमेशा ़िफल्मों के ऑपरेशन थिएटर जैसा लगता था. या तो अंदर ही अंदर आवाज़ आती,
शी इज़ नो मोर…या फिर किसी ने जैसे कह दिया हो…बधाई हो, ऑपरेशन सक्सेस हुआ है. जैसे ही वलन (सट्टा खुलना) मिलती, भीड़ टूटकर होटलों की ओर बहने लगती.शंकर सेठ, बड़ी होटल, शिवनारायणजी और खारवा वाले मदन दा की दुकानों पर रौनक आ जाती.गर्म दूध का कड़ाह पहले से चढ़ा होता. मलाई उतारी जाती,
मावाबाटी और रबड़ी के ऑर्डर गिनती में नहीं रहते. वलन पाने वाले उस रात राजा होते थे.मलाई मार का दूध, दो-दो मावाबाटी, रबड़ी
और साथ में पुरानी उधारी चुकाने की तसल्ली. सेठ भी जानते थे कि आज पैसा आएगा, इसलिए मुस्कान अपने-आप चेहरे पर आ जाती थी. और जिनकी किस्मत ने साथ नहीं दिया होता,
वे चुपचाप आते थे. न ज़्यादा बोलते, न आँख मिलाते. कल दे दूँगा.इतना कहकर चले जाते और अगले दिन की जंत्री के सहारे दाव जीतने वाले जानकारों से राय लेने लगते. यह सिलसिला कई दिनों, कई महीनों तक चला. फिर समय बदला.
मध्यप्रदेश डेली लॉटरी आई और रतन खत्री का वह जलवा धीरे-धीरे धुंधला पड़ गया. लेकिन महिदपुर रोड की उन रातों की स्मृति आज भी ज़िंदा है. जब भी रात के नौ बजते हैं, मुझे अब भी लगता है
कि कहीं न कहीं दूध का कड़ाह चढ़ा है, रबड़ी की खुशबू हवा में तैर रही है. और किस्मत अपने पत्ते फिर से फेंट रही है.
Doodh ki kadhayi garmagaram rabdi aur kesar wale doodh ka swad rishikesh me mila tha . Iska swad jisse pata hai wo dhoondh hi lete. Aapne beete dino ki yaad taza kar di.
यादें