यादें

फ़ुरसत मिलते ही,
झटक देती हूँ
यादों पर पड़ी धूल की परत को,
और पहुँच जाती हूँ
अतीत के उन पलों में,
जहाँ प्रणय की साधना में हमने-तुमने
रख लिए थे
शगुन के कुछ स्वस्तिक
दिलों की दहलीज़ पर।

बाँच लेती हूँ मन ही मन
वह सभी कविताएँ,
जो रहीं
आरंभ रचनाकर्म का।
प्यार का जिनमें झलकता था
सदा अस्तित्व ही।

बाँहों में आकाश समेटकर
गुनगुना लेती हूँ फिर कुछ पंक्तियाँ।
फिर अचानक आ खड़ी होती हूँ
उस दोराहे पर,
जहाँ अलग-अलग किया गया था
इच्छित अस्तित्व,
अविभाजित व्यक्तित्व।

अंतर्मन के चक्षुओं से
टटोलती हूँ हमारे रिश्ते के पैरों में
बँधी जंजीर को।
समझना चाहती हूँ रिवाज़ों के नाम पर लिखी
तक़दीर को।

अहसास करती हूँ
उस परम सत्य का,
जहाँ रह गईं
कुछ अनछुई बहारें,
बिन बरसे ही रह गए
प्रेमिल भावों के मेघ।

देखती हूँ ठहरकर
बादलों की ओट में धुँधला सा चाँद।
रफ़्ता-रफ़्ता
बाहर निकल आती हूँ
यादों के उस संसार से,
जो अभी भी अनिर्णीत है।

समझ न सकी कभी—
क्या है वह?
जीवन का स्वर्णिम काल
या अभिशाप!

भारती जैन ‘दिव्यांशी’ मोरेना, मध्य प्रदेश

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *